Wednesday, July 20, 2016

मुझे गर्व है कि मैं पवित्र सनातन धर्म से हूँ

मुझे गर्व है कि मैं उस पवित्र धर्म से हूँ ।
जिस पर"दूध बहाने" के आरोप लगाए जाते हैं
"खून बहाने" के नहीं ।

मुझे गर्व है की मैं उस धर्म से हूँ ।
जहाँ पशु की गर्दन पर "प्रेम पूर्वक हाथ फेरना" सिखाते हैं
"क्रुरता पूर्वक छुरी फेरना" नहीं ।

मुझे कहना अच्छा लगता है कि मेरे त्यौहार पूजा- यज्ञ करके, मिठाई व पकवान खिलाकर व खाकर मनाएँ जाते हैं,
कोई खून व हड्डियाँ फेंककर, माँस खिलाकर एवम् खाकर नहीं।

मुझे गर्व है कि मैं "सनातन धर्मी वैदिक हिन्दू" हूँ।
🚩 *जय श्रीराम* 🚩

-विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल

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काश हिन्दू धर्माचार्य ने अपना कर्तव्य निष्ठा के साथ निभाया होता

मित्रो ,
ना पाकिस्तान का अस्तित्व होता, ना भारत में जिहादियों का सम्मान होता, ना मेरे वीर जवानो पर पथराव होता, ना वन्देमातरम का अपमान होता, ना गौ वंश की हत्या होती, ना सनातन धर्म में जातिवाद होता, काश हिन्दू धर्माचार्य ने अपना कर्तव्य निष्ठा के साथ निभाया होता !! जय श्री राम 🚩

-विश्वजीत सिंह अनन्त
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घर- घर बाल संस्कार शाला चलाये

🚩राष्ट्र-धर्म की रक्षा कहने से नहीं करने से होगी, आज के किशोर कल के युवा है, भारत की असली शक्ति है, उनके अन्दर राष्ट्र सेवा व धर्म के संस्कार डालने के लिए भारत स्वाभिमान दल ने "बाल संस्कार शाला" चलाने का निर्णय लिया है ।🚩
👉🏻यदि आप हिन्दू है और आपको लगता है कि हमें अपना धर्म- संस्कृति व स्वाभिमान बचाना है तो अपने यहाँ बाल संस्कार शाला चलाकर 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को धर्म- संस्कृति की शिक्षा दे, राष्ट्र रक्षा के इस कार्य में भारत स्वाभिमान दल सदैव आपके साथ है 🙏🏻👏🏻
🚩आओं अपना कर्तव्य निभाये🚩
🚩घर- घर बाल संस्कार शाला चलाये🚩
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🚩बाल संस्कार शाला चलाकर राष्ट्र-धर्म रक्षा के अभियान में अपनी सक्रीय भूमिका निभाने के इच्छुक सदस्य ध्यान दे, बाल संस्कार शाला सप्ताह में एक दिन रविवार अथवा अन्य किसी निश्चित दिन चलानी होगी, समय अवधि दो घण्टा होगी, कक्षा नि:शुल्क होगी🙏🏻
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-विश्वजीत सिंह अनन्त
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Tuesday, July 19, 2016

" धन्य है भाई तारू सिंह जी "

" क्या इस्लाम स्वीकार करने से मै अमर हो जाऊँगा, क्या मुझे मौत नहीं आयेगी .. ? "

यदि मरना ही है तो मैं अपने गुरु के विचारों सिद्धातों पर चलते हुये हँसते हँसते मरना पसंद करूँगा, मैं हिन्दू धर्म छोड़कर, इस्लाम स्वीकार नहीं करुँगा

यह कहना था भाई तारू सिंह जी का‬

सन् 1745 में जब हिन्दू धर्म रक्षक सिख वीरो को ढूँढ ढूँढ कर कत्ल किया जा रहा था और खोज खबर देने वालों को ईनाम का लालच दिया जा रहा था तब सिखों को जंगलों में शरण लेनी पड़ी ।

पेशे से किसान भाई तारू सिंह जी सिख भाईयों को छुपकर भोजन खिलाया करते थे। पर कोई उनकी मुखबिरी कर देता है जिस वजह से उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है । ज़करिया खान के दरबार में काजी द्वारा कुरान व हदीस के आदेश अनुसार उन्हें मौत की सजा सुनाई जाती है ‪‎या फिर‬ केश कटवाकर इस्लाम कबूल करने कहा जाता है

पर तारू सिंह जी प्राण देना पसंद करते हैं

उनके केश जो उन्हें प्राणो से भी अधिक प्यारे थे‬, उन्हें खोपड़ी (बाल के साथ खाल भी) सहित छील कर इस्लामिक नरपिशाच निकाल देते है जिससे कुछ दिनों के बाद‬ उनकी दर्दनाक मृत्यु हो जाती है ।

आज भी पूरी दुनिया के सिख रोज अरदास में उन्हें याद करते हैं ।।

भारत स्वाभिमान दल तथा सनातन संस्कृति संघ भाई तारू सिंह जी को श्रद्धांजली अर्पित करता है

" धन्य है भाई तारू सिंह जी "

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गुरू पूर्णिमा

*हर साल आती है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*शिष्यत्व का ध्यान कराती है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*गुरु का स्मरण कराती है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*शिष्यों को वादे याद दिलाती है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*शिष्य की निष्ठा का प्रमाण है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*शिष्य की श्रद्धा की सम्पूर्णता है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*सद्गुरु के वरदानों का उत्सव है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*सद्गुरु केआशीषो का महोत्सव है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*गुरु के सान्निध्य की अनुभूति है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*गुरु सामीप्य का बोध है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*शिष्यत्व के जागरण का उत्सव है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*पूर्ण समर्पण का महोत्सव है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*आत्मस्वरूप का ज्ञान कराती है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*देहाभिमान को दूर करती है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*श्रद्धा निष्ठा से गुरुमय बनाती है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*गुरु भक्ति का सावन लाती है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*भाव संवेदना जगाने आती है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*शिष्य में देवत्व जगाती है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*दिव्य अनुदान वरदान बरसाती है*
*गुरुपूर्णिमा।*

*गुरु के स्नेह की याद दिलाती है*
*गुरुपूर्णिमा।*


जय हिन्द, जय हिन्द की सेना

अपने देश और और मातृ-भूमि के लिये सौ बार अपनी जान भी न्यौछावर करनी पड़े वह भी शायद कम होगा । हमारे देश और देशवासियों की तरफ बुरी नजर से आंख उठाकर देखने बालों की आंखे नोंचने का माद्दा है हममें । इतिहास गवाह है कि हमारी खामोशी को कमजोरी समझने की गलती करने बालों को हर बार धूल चटाई है हमने । हम हिन्दुस्तानी हमेशा पाक नीयत से जिंदगी बसर करते हैं इसलिये ऊपर बाले की कृपा और आशीर्वाद सदा हम हिन्दुस्तानियों के साथ रहा है । ना-पाक लोगों की सेना और जमात को हमेशा खदेड़ कर मुंह तोड़ जबाब दिया है हमने । भारत माता के एक-एक अंश (हम सब हिन्दुस्तानियों ) में वो शक्ति है कि दुश्मन का उसी मांद में जाकर भी हम शिकार कर लेंगें । हमारे शरीर का रोम-रोम और धमनियों में बह रही रक्त की एक-एक बूंद बस यही कह रही है ....
जय हिन्द , जय हिन्द की सेना ।
वन्दे मातरम् .....
हम हमारी सरकार को यह भरोसा दिलाते हैं कि देश की आन-बान-शान की रक्षा के लिये मर मिटने को तैयार हैं हम । एक बार ऐलान-ए-जंग का आदेश तो मिले । कसम भगवान की इस देश की पावन माटी की सपरिवार सब कुछ अपने देश के लिये न्यौछावर करने के लिये बिल्कुल तैयार हैं हम ।
वन्दे मातरम् .....
🚩भारत स्वाभिमान दल🚩


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गुरू के प्रति आभार की अभिव्यक्ति का दिन - गुरू पूर्णिमा

🙏  वंदे मातरम् साथियों,

*गुरू पुर्णिमा*
    
गोस्वामी तुलसी दास जी ने लिखा है-

गुरू बिन भवनिधि तरइ न कोई ।
जो बिरंचि संकर सम होई ।।

भले ही कोई व्यक्ति ब्रह्मा, और शंकर के समान क्यों न हो वह गुरू बिना भवसागर से पार नही उतर सकता है।

गुरू को भारतीय संस्कृति में अहम पद प्रदान किया गया है और उन्ही के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर लाती है गुरू पूर्णिमा।

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा कहा जाता है।

यह दिन गुरूओ की महत्वता रेखांकित करता है।
पूरे भारत में इस दिन लोग अपने अपने गुरूओ के दर्शन कर जीवन को धन्य करते है, नई राह पाते है। कई श्रद्धालु इस दिन गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते है। ब्रज में इस दिन को मुड़िया पूनो कहा जाता है ।

गुरू पूर्णिमा का यह दिन महाभारत को रचने वाले कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्म दिवस भी है। उन्होने चारो वेदो को संहिताबद्ध किया। वेदो को संहिताबद्ध करने के कारण गुरू वेद व्यास कहलाए।
वे वेदो के ज्ञान को प्रचारित कर सद् गुरू कहलाए और उनके प्रति आदर के कारण ही गुरू पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

इस तरह गुरू पूर्णिमा का दिन आभार की अभिव्यक्ति का दिन है।

भारत भूमि पर जितने भी अवतार अवतरित हुए उनके गुरू भी हुए है।

श्री राम के गुरू वशिष्ठ थे तो श्री कृष्ण के सांदीपनी। तात्पर्य यह है कि गुरू होना जरूरी है। गुरू के बिना जीवन का उद्धार नही है। गुरू बनाने का एक दार्शनिक तात्पर्य हमारे यहां यह भी बताया गया है कि हमें हर किसी से सीखने का प्रयास करना चाहिये।
यदि हमारे भीतर गुरू बनाने या सीखने का भाव नही है तो हमारी उन्नति अवरूद्ध हो सकती है।
दत्तात्रेय ने चौबीस गुरू बनाए थे और उन्हे गुरूओ के गुरू भी कहा जाता है
गुरू की महिमा का बखान हनुमान चालीसा में भी प्राप्त होता है जहां लिखा है

कृपा करौ गुरूदेव की नाई ।
अर्थ ये है कि हे नाथ, मुझ पर गुरू समान कृपा कीजिये।
हनुमानजी से यह प्रार्थना है कि वे गुरू भाव से हमें अपनी शरण में ले और हमारी चेतना को प्रखर बनाएं ।

*क्या करे गुरू पूर्णिमा पर*
**********************
जिन्हे आपने अपना गुरू माना है उनके दर्शन करे और आशीर्वाद प्राप्त करे ।
हिन्दू शास्त्रो में दीक्षा देकर विद्या प्रदान करने वाले गुरू व माता- पिता को सद्गुरू माना गया है तो उनकी पूजा इस दिन करना चाहिये।
गुरूओं के गुरू अर्थात परमात्मा की पूजा करनी चाहिये ।

*दुविधा मे गुरू का सहारा*
*******************
गुरू को भारतीय संस्कृति मे ऐसे आश्रय के तौर पर देखा गया है जो विपरीत या कठिन परिस्थितियों मे हमारा मार्गदर्शन करता है।

कुरूक्षेत्र मे जब अर्जुन
किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया तो श्री कृष्ण ने गुरू रूप में उनका मार्गदर्शन किया। उसे जीवन के सार से अवगत कराया ।
अर्जुन गुरू द्रोण से शस्त्र विद्या में पारंगत हुआ था लेकिन जब जीवन समर में अपनो से युद्ध की दुविधा सामने आई तो अर्जुन ठिठक गया और तब गुरू रूपी श्री कृष्ण ने उनकी शंकाओ का समाधान किया।
हमें भी जीवन में जब कभी शंकाएं घेरती है तो हमे गुरू ही मार्ग दिखाते है। इसलिये गुरू की महत्ता है
हमारी समस्या का समाधान गुरू के पास होता है ।

यह प्राचीन काल से चली आ रही परम्पराओं का वर्णन है और यह सभी परंपरायें ही हमारे जीवन का आधार हैं और हमें व् हमारे राष्ट्र को समृद्ध बनाती हैं।

हम आधुनिकता की दौड़ में अपने जीवन मूल्यों को कहीं पीछे छोड़ आये हैं पर जिन्होंने हमें जीवन की नई राह दिखाई और हमें धर्म और भारतीयता से हमारी पुनः पहचान कराई ऐसे *सद्गुरूओं* को नमन व् प्रणाम किये बिना इस पर्व का कोई महत्त्व नहीं है।
*देश के सात लाख से अधिक संतों, क्रान्तिकारी बलिदानियो* ने हम सबके अंदर एक राष्ट्र प्रेम और स्वदेशी प्रेम का भाव जागृत किया और उन्होंने ही हमारा परिचय भारत के प्राचीन व् गौरवशाली इतिहास से कराया वरना आज तक की हमारी सरकारों ने तो सच को दबाने में कोई कसर नहीं रखी थी।

आज इस गुरु पूर्णिमा के अवसर पर *उन सब ज्ञात अज्ञात गुरूजनो को शत् शत् नमन व् वन्दन 🙏*

*ऊँ गुरूवे नम:*

अपना देश अपनी सभ्यता अपनी संस्कृति अपनी भाषा अपना गौरव

वंदे मातरम्

-विश्वजीत सिंह अनन्त

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