Sunday, August 7, 2016

अल तकिया

इस्लाम में 2 पालिसी है, पहला अल तकिय्या और दूसरा कितमान,
आइये दोनों के बारे में विस्तार से जान लें, फिर जितना सेकुलरिज्म निभाना हो निभाएं, ये पॉलिसियां इस्लाम के विस्तार के लिए बड़ी चालाकी से बनाई गयी है,

1- अल तकिय्या - इसका अर्थ है ढोंग करना, ढकोसला फैलाना, सत्य को नकारना

* कब किया जाता है - जब किसी इस्लामी किताब में (कुरान, हदीस) में कोई गलती पकड़ी जाये कोई आपत्तिजनक चीज हो तो मुस्लिम उसे झट से  इंकार कर देंगे कहेंगे ऐसा लिखा ही नहीं, उस समय की बात और होगी, आज वो रद्द हो चुकी है इत्यादि , इत्यादि , पर कभी उस किताब को सुधारने की बात नहीं कहेंगे।,भूल से भी
2- कितमान - इसका अर्थ है झूठ फैलाना, आडम्बर करना, आरोप लगाना
* कब किया जाता है - जब मुस्लिम अल्पसंख्यक हो, तो वहां पर बहुसंख्यक समुदाय से झूठ बोलो, कहेंगे कि
इस्लाम में तो ऐसा है ही नहीं, कुरान इसकी इज़ाज़त नहीं देता, उदाहरण, अभी ओवैसी ने बयान दिया “भारत माता की जय नहीं कहूँगा” तो भारत का बहुसंख्यक समाज एकजुट होने लगा तो मुस्लिम निकल पड़े भारत माता की जय करने, कहने लगे की इस्लाम तो ऐसा बताता ही नहीं, जबकि इस्लाम में देशभक्ति की इज़ाज़त नहीं, कुरान में “उम्मह” का आदेश है, देशभक्ति हराम है,
कितमान  , के अनुसार, गलती पकडे जाने पर आप दुसरो की गलती निकालने लगो, नहीं निकाल पाये तो आरोप लगाओ, हिंसा करो, गाली गलौज से काम चलाओ ,,,,
सुन्नी विद्वान इब्न कथिर की व्याख्या के अनुसार, मुस्लिमो और गैर मुस्लिमो के बीच कभी मित्रता नहीं होनी चाहिए, अगर किसी कारण वश ऐसा करना भी पड़े तो वो तब तक ही  मित्रता   रहना चाहिए जबतक मकसद पूरा नहीं हो जाता।
मुस्लिम, अल तकिय्या और कितमान अल्पसंख्यक रहते हुए करते है, ताकि बहुसंख्यक गुमराह रहे

* दारुल हर्ब - ये वैसी परिस्तिथि है जहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यक हो और कोई दूसरा समाज बहुसंख्यक हो, दारुल हर्ब ने आप मीठी छुरी बन जाओ, इस्लाम को शांति का मजहब बताओ, बहुसंख्यक को गुमराह करो, और अपना कार्य (जिहाद) करते रहो जबतक दारुल हर्ब से दारुल इस्लाम (जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक)

बनाओ फिर शरिया लागू कर दो।

*यह है इस्लाम की अंदरूनी सच्चाई *

मैं कुरान से दूर कैसे हुअा

मैं बचपन से सोचता था,कि कुरान के अतिरिक्त और कोई धर्म पुस्तक नही, और इस्लाम को छोड़ कर दूसरा कोई धर्म ही नही है | क्यों कि बचपन से यही शिक्षा मुझे बिरासत में मिली थी |
परन्तु 32 वर्ष आयु के बाद,जब मैं एक पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश, को देखा, जिस में वैदिक मान्यता वैदिक सिद्धांत,और वैदिक ऋषि परम्परा को पढ़ कर देखा, तो मेरी ऑंखें खुलीकी खुली रह गई | कारण मैं अब तक यही जानता था,कि कुरान ही एक मात्र किताब है धरती पर जो आसमानी है,और अल्लाह का दिया हुवा मानव मात्र के लिए उपदेश है |अथवा यही ईश्वरीय एक मात्र ज्ञान है,जो आस मानी है, उपर से उतरा हुवा,कुरानपर सवाल करना,अथवा सन्देह संभव नही है |
अब वैदिक मान्यता, ईश्वर और ईश्वरीय ज्ञान क्या है किसे ईश्वरीय ज्ञान कहा जाना चाहिए उसकी मान्यता क्या है कसौटी क्या है, इन सभी विषयों को जब भली भांति सत्यार्थ प्रकाश व ऋग्वेदादी भाष्य्भुमिका ऋषि दयानन्द रचित पढने लगे, और उसके गहराई में जब दुबे तो मेरे मनमें एक के बाद एक जिज्ञासा होती गई और उसका जवाब भी उन्ही वैदिक मान्यता से हमें मिलती ही चली गई आगे क्या है, और क्या है,इस लालसा में डुबकी लगाते ही रहे |
आज 33 वर्षीं से अनेक कुरान वेत्ताओं से शैखुल हदीस {हदीसों के माहिर }और मुफ़स्सिरे कुरान {कुरान के भाष्यकार} इस्लाम जगत के अनेक आलिमों से मिले और बहुतों से पत्राचार किया, किन्तु आज तक मेरे जिज्ञासा मन को शांत नही कर सके और ना आज तक कोई सन्तोष प्रद उत्तर ही दे पाए |
पिछले दिनों 85 से 90 तक मैं कोलकाता में बंगाल आर्य प्रतिनिधि सभामें,सार्व देशिक सभा द्वारा नियुक्त था | अनेक समय से मैं बंगाल से बाहर दिल्ली में  रहा जब 85 में कोलकाता में रह कर वैदिक धर्म का प्रचार कार्य में लगे रहे, 42 शंकर घोष लेंन कोलकाता, 6= बंगाल सभा की बिल्डिंग में रहता था | प्रचार कार्य के लिए एक दिन मैं बड़ाबाजार आर्य समाज में जाने लगा, मुझे रास्तेमें एक पुराने सहपाठी मिले, उसने मुझे धोती पहने देख कर कोसने लगा|  
कहा तू एक मौलवी का बेटा,और खुद भी अलिम हो कर यह काफिराना लिबास में तू घूम रहा है ? क्या तुझे यह मालूम नही कि {मन तश्ब्बाहा बेकौमिन} का फतवा लगेगा तेरे उपर? अर्थात जो मुसलमान जिस कौम के लिबास {परिधान} में,दुनिया में रहेगा, अल्लाह तायला हश्र के दिन,उसी कौमके साथ उसे उठाएंगे |
मैंने कहा बिलकुल ठीक बात है, पर मैं तुझसे पूछता हूँ कि यह धोती काफिराना लिबास है |और यह पैन्ट,शर्ट,कोर्ट,टाई, आदि,यह लिबास किन लोगोंका है भाई? क्या आज तक तूने अपने किसी भाई को अथवा अपने कौमके लोगों को बताया है, की भाई यह ईसाइयत वाला लिबास आप लोग किसलिए पहनते है ?
भारत में रहकर भारतीय परिधान को क्यों नही पहनते,भारत में रहकर इंग्लॅण्ड, व.लंडन वाला लिबास पहना जा सकता है, अरबियन लिबास पहना जा सकताहै, पाकिस्तानी शलवार शूट पह्नाजा जकता है | किन्तु भारत में रहकर भारतीय परिधान पहनना काफिराना लिबास कह कर क्या तू भारत का अपमान नही कर रहा है ? 
उसने कहा,भारत में तो मना नही है, इन परिधान में,मैंने कहा मेरे भाई जरा ठन्डे दिमाग से सोच | कि अगर मक्का में मदीना,में कोई धोती पहन कर जाता है तो उसे, वहां रोका जायगा कि नही ? पहली बात तो कोई भी गैर मुसलिम को मक्का या मदीना में जाने ही नही दिया जायगा,वहां कपड़े की बात ही क्या है काफिरों को वहां जाने नहीं दिया जायगा | तू कपड़े की बात क्या कर रहा हैं | अब वहां एक काफिराना लिबास में कोर्ट, पैन्ट, टाई वाला जा सकता है,किन्तु एक धोती वाला इनसान को जाने नही दिया जायगा | उसनेकहा यह बात तो है, मैंने कहा, भारत में तू अरबियन लिबास में रहता है अथवा इंगलैंड वाला लिबास में रहता है, आज तक तुझे किसीने कहा या पूछा कि यह लिबास कौन लोगों का है ?
मैंने कहा इससे अंदाजालगा की तुम इस्लाम वालों को भारतीय लिबास{परिधान} ही पसन्द नही तो भारतीय लोगों को पसन्द करना कैसे संभव होगा ? कितनी संकीर्णता है, तुम इस्लाम वालों में, और इन भारत जैसे काफ़िर मुल्कवालों को भी तुम सहन नही करते | भारत के लोग कितने उदार हैं, यहाँ के लोगों में नफरत ही नही है पर तुम इस्लाम वाले इसी देश में रह कर  भी इस देश के परिधान को अपनाने को तैयार नही हो |
छोड़ उस अरब को यही भारत में ही बता की धोती पहनकर कोई मस्जिद में जाना चाहता है क्या तो उसे मस्जिद में घुसने देगा अथवा बाहर से उसका लाँग उतरवाएगा ? यानी कोई भी धोती वाला लाँग उतारे बिना मस्जिद में घुस नही सकता | बता यह कौनसी मानसिकता की बात है ? फिर तुमलोग भाईचारे की बात करते हो ? तुम लोगों को शर्म होना चाहिए, की इन भारतियों से किस प्रकार की नफरत तुम्हें सिखाया इस्लाम ने ? फिर भी तुम कहते हो इस्लाम का अर्थ शांति है, भाईचारा है ? अरे मानव को मानवों से नफरत करना तो इस्लाम ही सिखाया है मुसलमानों को मुसलमान छोड़ काफिरों से,यहूदी,नासरा  से दोस्ती तक रखने को मना किया है अल्लाह ने देखो अपना कुरान | 
सूरा- इमरान -28= सूरा- निसा =144 = सूरा मायदा =51+57 =और भी है | मेरी पुस्तक वेद और कुरान की समीक्षा से उठा कर दिया हूँ | इसे सही ढंग से पड़ें और विचार करें, दुनिया में नफरत कों फैलाया है ?
श्री महेन्द्रपाल आर्य जी
वैदिक प्रवक्ता

कलमा शहादतके पढ़ने से कोई मुसलमान बन जाता ?

कलमा शहादतके पढ़ने से कोई मुसलमान बन जाता ?
मुसलमान बनते किस प्रकार उसे जानना जरुरी है, इस से पहले कोई भी कितना कलमा पढ़े या पढ़ाये,मुसलमान नही बन सकता | इसकी जो बुनियादी चीज है उसे ईमान कहते हैं | इस्लामिक मान्यता की किताब भरे पड़े हैं, इसका नाम है किताबुल ईमान | इसके 6 स्तम्भ है,अरकान हैं,पिलर हैं,भिंत है | इसे जाने बिना, अपनाये बिना, कोई मुसलमान हो, ही, नही सकता | कोई कितना चिल्लाये बोले और बके,वह बकवास ही होगा ईमानदार नहीं बन सकता| [यानि मुसलमान नही बनसकता ]
इसके 6 स्तम्भ है,अरकान हैं,पिलर हैं,भिंत है, जो इस प्रकार हैं |
1 =अल्लाह पर विश्वास करना |
2 =अल्लाह के फरिश्तों पर विश्वास करना |
3 =अल्लाह की किताबों पर विश्वास करना |
4 =अल्लाह के रसूलों पर विश्वास करना |
5 = कयामत या प्रलय के दिन पर विश्वास करना |
6 = अच्छी और बुरी किसमत का बनाने वाला अल्लाह है |
आज मैं इस्लाम के मानने वालों से पूछता हूँ क्या मात्र कलमा शहादत के पढ़ने से ही कोई मुसलमान बन जाता है ?
अगर बनजाता है तो फिर कुरान व हदीस में जो, इस्लाम का दायरा या अरकान लिखे हैं बताए हैं उसका क्या तात्पर्य ? जो ईमान का दायरा है वह क्या और कैसा है,और वह किनके लिए है? अगर सिर्फ दूसरा कलमा के उच्चारण से कोई मुसलमन बनजाता है उसका प्रमाण कहाँ और किस किताब से प्रमाणित है ? जब की कुरान में अल्लाह ने फ़रमाया,यहाँ रसूलों पर शब्द है | फिर कोई मात्र मुहम्मदको रसूलमाने तो सही क्या हैं ?जाकिर नाईक का, अथवा अल्लाह का ?
لَّيْسَ الْبِرَّ أَن تُوَلُّوا وُجُوهَكُمْ قِبَلَ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ وَلَٰكِنَّ الْبِرَّ مَنْ آمَنَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالْكِتَابِ وَالنَّبِيِّينَ وَآتَى الْمَالَ عَلَىٰ حُبِّهِ ذَوِي الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينَ وَابْنَ السَّبِيلِ وَالسَّائِلِينَ وَفِي الرِّقَابِ وَأَقَامَ الصَّلَاةَ وَآتَى الزَّكَاةَ وَالْمُوفُونَ بِعَهْدِهِمْ إِذَا عَاهَدُوا ۖ وَالصَّابِرِينَ فِي الْبَأْسَاءِ وَالضَّرَّاءِ وَحِينَ الْبَأْسِ ۗ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ صَدَقُوا ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُتَّقُونَ [٢:١٧٧]
नेकी केवल यह नहीं है कि तुम अपने मुँह पूरब और पश्चिम की ओर कर लो, बल्कि नेकी तो उसकी नेकी है जो अल्लाह अन्तिम दिन, फ़रिश्तों, किताब और नबियों पर ईमान लाया और माल, उसके प्रति प्रेम के बावजूद नातेदारों, अनाथों, मुहताजों, मुसाफ़िरों और माँगनेवालों को दिया और गर्दनें छुड़ाने में भी, और नमाज़ क़ायम की और ज़कात दी और अपने वचन को ऐसे लोग पूरा करनेवाले है जब वचन दें; और तंगी और विशेष रूप से शारीरिक कष्टों में और लड़ाई के समय में जमनेवाले हैं, तो ऐसे ही लोग है जो सच्चे सिद्ध हुए और वही लोग डर रखनेवाले हैं | वही मुत्तकी हैं | सूरा बकर =आयत =177 =
آمَنَ الرَّسُولُ بِمَا أُنزِلَ إِلَيْهِ مِن رَّبِّهِ وَالْمُؤْمِنُونَ ۚ كُلٌّ آمَنَ بِاللَّهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِّن رُّسُلِهِ ۚ وَقَالُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا ۖ غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ الْمَصِيرُ [٢:٢٨٥]
रसूल उसपर, जो कुछ उसके रब की ओर से उसकी ओर उतरा, ईमान लाया और ईमानवाले भी, प्रत्येक, अल्लाह पर, उसके फ़रिश्तों पर, उसकी किताबों पर और उसके रसूलों पर ईमान लाया। (और उनका कहना यह है,) "हम उसके रसूलों में से किसी को दूसरे रसूलों से अलग नहीं करते।" और उनका कहना है, "हमने सुना और आज्ञाकारी हुए। हमारे रब! हम तेरी क्षमा के इच्छुक है और तेरी ही ओर लौटना है।" सूरा = बकर =285 =
इस आयात में अल्लाह ने स्पस्ट बताया ईमान का दायरा क्या है, जिसका अर्थ है विश्वास करना सिर्फ जुबान से कोई बोले, बात नही बनेगी दिलसे मानना,और जुबान से इकरार करना होगा | और सिर्फ, मोहम्मद को रसूल मानताहूँ नही है| अल्लाह पर =रसूलों पर =फरिश्तों पर =किताबों पर = अब कीई कहे मुहम्मद अल्लाह का बाँदा और उसका रसूल है | कुरान में इसकी मान्यता ही नही है |
जाकिर नाईक दुनिया वालों को गुमराह कर रहा है, जो खुद नही जनता इस्लाम को | यही डर होने के कारण आज थ सामने नहीं आ पाया, और ना कयामत तक आ सकता है |
श्री महेन्द्रपाल आर्य जी
वैदिक प्रवक्ता

Saturday, August 6, 2016

नाड़ा" और "पाज़ामा

"नाड़ा" और "पाज़ामा"!
अगर पज़ामें में नाड़ा न हो तो, वह पज़ामा, इंसान को कहीं भी नंगा होने के लिये बाध्य कर सकता है? यही हाल हिन्दुओं का है, हिन्दुओं ने सनातन का पज़ामा तो पहन लिया है कि वे ही सनातनी भी है, पर उस पज़ामें में सनातन का नाड़ा नहीं है!
वह नाड़ा कहीं खो गया है!
सत्य सनातन में मात्र चार वर्ण थे- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शुद्र। चारो समाज़ के अविभाज्य अंग थे, एक दूसरे के सम्मानीय थे।
ज्ञान सत्ता पर ब्राह्मणों (द्विजों) का वर्चस्व इसलिये था कि वे ही ज्ञान का दान करके मानव को मानव बनने की शिक्षा देते थे, इसीलिये पूजित भी थे! पर, हिन्दुत्व का ब्राह्मण वेदपाठी न होकर पुजा-पाठी बन गया और इहलोक से परलोक तक का ठेकेदार बन गया?
सत्य सनातनी क्षत्रिय सामाजिक समरसता का रक्षक था, पर हिन्दुत्व का क्षत्रिय सत्ता और पद का भोक्ता बन गया?
सत्य सनातनी वैश्य, सामाजिक जरुरतों का सत्यनिष्ठ मूल्य-आधारित पुर्तिकर्ता था, पर हिन्दुत्व का वैश्य फ़ायदे- और-लाभों का अर्जित करने का चालक व स्वार्थी वर्ग बन गया?
सत्य सनातनी शुद्र सामाज को अपनी सेवा से लाभांवित करने वाला समुदाय था, जो हिन्दुत्व की अवधारणा में न जाने कब अछूत भी बन गया, शोषित व पीड़ित भी बना दिया गया?
फ़िर भी, हिन्दुओं ने अपने को सनातन
का उत्तराधिकारी मान रखा है?
जाहिर है, ऐसे में अधर्मियों के समुदाय को अपनी मनमानी करने का मौका मिला और उन्होंने अमुक-अमुक धर्म नाम की संस्था बना कर अपनी अधर्मिता को स्वीकार्य बनाने की कवायद में लग गये!
ऐसे में अगर "मानवता" नाम का नाड़ा कहीं खो गया तो इसमें नाड़े की भी उतनी ही गलती है?
कोई है जो इस "नाड़े" को वापस "पज़ामें" में डाल सके?

Friday, August 5, 2016

संस्कृत भाषा में शुभकामनाएँ

संस्कृत भाषायां शुभकामना: ( संस्कृत भाषा में शुभकामनाएँ )
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नमस्ते
शुभकामना: = शुभकामनाएँ
मम शुभकामना: = मेरी शुभकामनाएँ
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अनुगृहीतोSस्मि = आपका आभारी हूँ , कृतज्ञ हूँ (पुल्लिंग )
अनुगृहीताSस्मि = आपकी आभारी हूँ , कृतज्ञ हूँ (स्त्रीलिंग )
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उपकृतोSस्मि = आपका आभारी हूँ , कृतज्ञ हूँ (पुल्लिंग )
उपकृताSस्मि = आपकी आभारी हूँ , कृतज्ञ हूँ (स्त्रीलिंग )
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धन्योSस्मि = आपका आभारी हूँ , कृतज्ञ हूँ (पुल्लिंग )
धन्याSस्मि = आपकी आभारी हूँ , कृतज्ञ हूँ (स्त्रीलिंग )
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मुदितोSस्मि = मैं खुश हूँ (पुल्लिंग )
मुदिताSस्मि = मैं खुश हूँ (स्त्रीलिंग )
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अभिनन्दनम् = बधाई हो
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जन्मदिवसस्य हार्दिक्य: शुभकामना:।
= जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ।
जन्मदिवसस्य कोटिश: शुभकामना:।
= जन्मदिन की कोटि कोटि शुभकामनाएँ।
जन्मदिवसस्य अनेकश: शुभकामना:।
= जन्मदिन की अनेक शुभकामनाएँ।
जन्मदिवसस्य अभिनन्दनानि।
= जन्मदिन की बधाईयाँ।
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त्वं जीव शतं वर्धमान:। = तुम सौ साल जिओ।
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>> शुभकामना: के स्थान पर मंगलकामना: भी लिख सकते हैं , बोल सकते हैं ।
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पुत्र प्राप्त्यर्थं हार्दिक्य: अभिनन्दनानि।
= पुत्र प्राप्ति की हार्दिक बधाईयाँ।
पुत्रस्य जन्मन: हार्दिक्य: अभिनन्दनानि।
= पुत्र के जन्म की हार्दिक बधाईयाँ।
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पुत्री प्राप्त्यर्थं हार्दिक्य: अभिनन्दनानि।
= पुत्री प्राप्ति की हार्दिक बधाईयाँ।
पुत्र्या: जन्मन: हार्दिक्य: अभिनन्दनानि।
= पुत्री के जन्म की हार्दिक बधाईयाँ।
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शुभ-विवाहार्थम् अभिनन्दनानि।
= शुभ विवाह की बधाईयाँ।
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विवाहस्य वर्धापनदिनस्य अभिनन्दनानि।
= वैवाहिक वर्षगांठ की बधाईयाँ।
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यशसा वर्धते भवान् ।
= आपकी सफलता के लिए बधाईयाँ / शुभकामनाएँ।
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पदोन्नति अर्थं शुभकामना: / अभिनन्दनानि।
= पदोन्नति के लिए शुभकामनाएँ / बधाईयाँ।
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समारोहस्य कृते हार्दा: शुभशया: ।
= समारोह के लिए (कार्यक्रम के लिए ) शुभकामनाएँ।
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युवयोः वैवाहिकजीवने सर्वदा शुभं भवतु।
= आपके वैवाहिक जीवन में हमेशा शुभ हो।
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नवदम्पत्योः वैवाहिकजीवनं सुखमयं भवतु।
= नवदंपति का वैवाहिक जीवन सुखमय हो।
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शिवास्ते पन्थानः। = आपकी यात्रा मंगलमय हो।
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शीघ्रमेव स्वस्थ: भवतु। = आप शीघ्र ही स्वस्थ हों।

Monday, August 1, 2016

दलित

1947 के पहले से भारत के जंगलों में रहने वाले लोगो को मूल निवासी कहा गया अंग्रेजी इतिहासकारों ने और उनको ही भारत ( वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बर्मा, श्रीलंका) का प्राचीन और वास्तविक निवासी बताया गया। और ब्राह्मणों को इंग्लैंड का निवासी बताया गया, ( किंतु वैश्य , क्षत्रिय, शुद के विषय में नहीं बताया गया )
अंग्रेजों के दलाल भारतीयों ने अपने मालिको की इस बात को स्थापित करने में अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा दी।

किंतु सनातन धर्म व आर्य समाज के प्रकांड विद्वानो के कारण ये षड्यंत्र सफल नहीं हो पाया।

फिर इसी षड्यंत्र की अगली कड़ी के रूप में इन लोगो को आदिवासी घोषित किया गया , आदिवासी यानी आदिकाल से भारत में रहने वाले और स्थाई पहचान देने के लिये संविधान में आरक्षण दिया गया। ये उपाय कारगर हुआ और  st sc वर्ग अब समाज से कुछ अलग हो गया। लेकिन सरकारी नौकरी में आकर, पढ़ लिखकर ये लोग भी राष्ट्रभक्ति की भावना में आने लगे।
तो
अब नया शब्द   ''  दलित  ''  गढ़ा गया। और इसको पहचान देने और हिन्दू वर्ग से अलग करने के लिये जय भीम जय मीम का नारा दे दिया गया
साथ ही

अखबारों, टीवी चैनलों में यदि मुसलमान अपराध करे तो उसका धर्म नहीं बताया जाता
पर
यदि 2 हिंदुओ में लड़ाई हो जाए तो अचानक एक सवर्ण और दूसरा दलित हो जाता है और अखबारों, टीवी में दिखाया जाता है कि हिन्दू ने दलित को पीटा, ह्त्या की,।
इस समाचार को पढ़कर दलित में जय भीम जय मीम की भावना प्रबल होते जा रही है और पढ़े लिखे लोग, जो पहले st sc के आरक्षण के लॉलीपॉप में नहीं आ पाए थे, ये नई पीढ़ी भी सरकार की हिन्दू विरोधी नीतियों से बौद्ध व मुसलमानों के साथ एकरस होती जा रही है।

तो
ऐसा षड्यंत्र क्यों ??

क्योंकि

भारत लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र में योग्यता की नहीं, वोट की चलती हैं, असली वोटर यहाँ गरीब वर्ग होता है जो बीमार, बुजुर्ग होने के बाद भी सपरिवार 100% वोट डालने जाता है।

इसीलिए मुसलमान व बौद्ध लोग हिन्दू समाज के अन्दर जातिवाद फैलाकर स्वर्ण दलित का खेल खेलकर हिन्दू समाज को तोड़ना चाहते है, जिसमें वो इंडियन संविधान की कृपा से सफल भी हो रहे हैं। मुसलमान व बौद्ध जानते हैं कि जय भीम जय मीम चलेगा तभी वो इस देश पर संविधानिक रूप से कब्जा कर पायेगा, एक बार कब्जा हो जाये तो फिर कोई हिन्दू उनको इस्लामिकरण से नहीं बचा पायेगा।
तो

ये पूरी रणनीति

यह लोकतंत्र पर हिन्दू विरोधी तत्वों द्वारा कब्जा कर देश का इस्लामिकरण करने की नई योजनाबद्ध सामाजिक तकनीक है।

स्वयं हम कितना भी प्रयत्न कर ले
किंतु टीवी चैनल और इन लोगो को सामूहिक रूप से प्रभावित करने वाले तत्व योजनाबद्ध रूप से इनके बीच पहुच रहे है।
तो

स्पष्ट है कि

यदि इस नीति को तोड़ा नहीं गया

तो दस वर्ष के पश्चात हिन्दुओं द्वारा आत्म रक्षा के पूर्ण प्रयास करने के बाद भी अपना अस्तित्व बचाना असंभव जैसा कार्य होगा।

विश्वजीत सिंह अनंत
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल

शहीद का अर्थ

शहीद एक उर्दू का शब्द है। जो की अरबी शब्द फिदाइन का उर्दू अनुवाद है। फिदाइन या शहीद शब्द का सबसे पहली बार जिक्र कुरान में हुआ। इस में बताया गया है जो अल्लाह की राह में अल्लाह के लिए अपनी जान कुर्बान कर देते है जो अल्लाह के लिये फ़िदा हो जाते है उनको फिदाइन या शहीद कहा जाता है ।

अब हमें देखो। हम लोग उन लोगो को भी शहीद बोलते है जो इन इस्लामिक आतंकवादियो से लड़ते हुए अपना जीवन बलिदान कर अमरत्व को प्राप्त हुए।

क्या उनको शहीद बोलना सही है ??

उन वीर आत्म बलिदानियों के लिए शहीद शब्द गाली के समान है।
उनकी आत्मा क्या सोचती होगी की हम जीते जी मुसलमान न बने। बल्कि अपने धर्म के लिए बलिवेदी पर न्योछावर हो गए और हमारे बच्चो ने हमें मरने के बाद शहीद बोलकर मुसलमान बना दिया।

धन्य हो आप सब को जो बिना कुछ जाने अपने वीर बहादुर पूर्वजो को शहीद बोलकर गालिया देते हो

राष्ट्र पर मरने वालो को बलिदानी कहते है, इसके लिए संस्कृत में सटीक शब्द है "हुतात्मा" अपने को राष्ट्र पर आहुत कर देने वाली महान आत्मा।

-विश्वजीत सिंह अनंत
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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