भारत स्वाभिमान दल एक गैर सरकारी सामाजिक स्वयंसेवी संगठन है । इस संगठन का मुख्य उद्देश्य भारतीय संस्कृति की रक्षा व संवर्द्धन करना तथा सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व आध्यात्मिक सभी प्रकार की व्यवस्थाओं का परिवर्तन कर भूख, भय, अभाव, अशिक्षा व भ्रष्टाचार से मुक्त स्वस्थ, समृद्ध, शक्तिशाली एवं संस्कारवान भारत का पुनर्निर्माण करना है । भारत स्वाभिमान दल से जुड़ने के लिए हमारे वाट्सएप्प नंबर 8755762499 पर संपर्क करें।
Friday, August 21, 2015
सुबह का खाना सबसे अच्छा
सुबह का खाना सबसे अच्छा
हमारे भोजन की दिनचर्या अत्यधिक बिगड़ गर्इ है ना तो हम अपनी प्रकृति के अनुसार भोजन करते हैं और ना ही सही समय पर भोजन करते हैं । देर रात में भोजन करना सबसे हानिकारक है क्योंकि उस समय हमारी जठराग्नि सबसे मंद होती है जिसके कारण भोजन का पाचन भली-भांति नहीं हो पाता और वह सड़कर कर्इ प्रकार की बीमारियों को जन्म देता है। दिन में सूर्य के प्रकाश के ताप से जठराग्नि सबसे अधिक सक्रिय रहती है जो भोजन के पाचन के लिये उत्तम है इसलिये महर्षि वागभट्ट ने कहा है कि प्रातः काल सूर्योदय से ढाई घण्टे के अन्दर भरपेट भोजन करना चाहिये क्योंकि उस समय जठराग्नि सबसे तीव्र होती है। फिर दोपहर के बाद शाम को 4-6 बजे के बीच में भोजन ग्रहण करना चाहिए क्योंकि सूर्यास्त के बाद जठराग्नि मंद होने लगती है । इसलिए रात में भोजन ना करें।
सुबह भोजन के तुरन्त बाद ऋतु के अनुसार किसी भी फल का रस ले सकते हैं।
दोपहर में खाने के तुरन्त बाद छाछ या मठ्ठा ले सकते हैं।
शाम के भोजन के बाद, रात में दूध पीकर सोना सर्वोत्तम है।
भोजन की दिनचर्या में इतना भी परिवर्तन हो जाये तो स्वास्थ्य काफी अच्छा रहता है।
भोजन
भोजन जब भी करें तो ज़मीन पर चौकड़ी मारकर ही करें क्योंकि हमारे कूल्हों के ऊपर एक चक्र होता है जिसका सीधा सम्बन्ध जठराग्नि से होता है इसलिए सुखासन (आल्ति-पालती) मारकर सीधे बैठकर भोजन ग्रहण करने से जठराग्नि तीव्रता से काम करती है, परन्तु जब हम कुर्सी पर बैठकर या खड़े होकर भोजन करते हैं तो इसका ठीक उल्टा होता है इसलिये कभी भी खड़े होकर या कुर्सी में बैठकर भोजन नहीं करना चाहिये । भोजन लेने के बाद दस मिनट वज्रासन में अवश्य बैठना चाहिए जिससे हमारा भोजन अच्छी तरह से अमाशय में पहुँच जाता है। 24 घण्टे में यदि हम एक बार भोजन करें तो वह सबसे अच्छा पचता है क्योंकि शरीर में बनने वाला पाचक रस पूर्ण रूप से उसी कार्य में प्रयुक्त होता है इसीलिये ऋषि-मुनि तपस्वी लोग एक बार के भोजन से ही लम्बी आयु जीते थे। अगर दो बार भोजन करें तो भी अच्छा है सामान्य रुप से कम से कम दो बार अवश्य भोजन करें और अधिक से अधिक 24 घण्टे में 3 बार ही भोजन करें, क्योंकि हम जितनी अधिक बार भोजन करते हैं हमारा पाचक रस उतनी मात्रा में बँटता जाता है और पाचन की शक्ति कम होती जाती है।
लाभ:- पित्त की अधिकता के कारण होने वाले रोगों से छुटकारा मिलता है। अपच, खट्टी डकारें, अम्लता, एसिडिटी, रक्त विकार, उच्च रक्तचाप, मोटापा आदि रोगों में लाभ प्राप्त होता है।
विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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सैंधा नमक / काला नमक /डेले वाला नमक का ही उपयोग करे !
सैंधा नमक / काला नमक /डेले वाला नमक का ही उपयोग करे !
राजीव भाई आयोडीन के नाम पर हम जो नमक खाते हैं उसमें कोर्इ तत्व नहीं होता। आयोडीन और फ्रीफ्लो नमक बनाते समय नमक से सारे तत्व निकाल लिए जाते हैं और उनकी बिक्री अलग से करके बाजार में सिर्फ सोडियम वाला नमक ही उपलब्ध होता है जो आयोडीन की कमी के नाम पर पूरे देश में बेचा जाता है, जबकि आयोडीन की कमी सिर्फ पर्वतीय क्षेत्रों में ही पार्इ जाती है इसलिए आयोडीन युक्त नमक केवल उन्ही क्षेत्रों के लिए जरुरी है।
सेन्धा नमक समुद्र के जल और धूप की गर्मी से वाष्पित होकर बनने वाले नमक में सोडियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम, पोटेशियम जैसे तत्व मिले रहते हैं ये तत्व वर्षा के जल के द्वारा जमीन की मिटटी से मिलते हुए समुद्र में मिलते हैं और यही नमक में आते हैं। इसलिए खड़ा नमक अधिक अच्छा है, लेकिन सोडियम की मात्रा अधिक होने के कारण वह शरीर में नुकसान भी करता है। इसकी तुलना में सेंधा नमक /काला नमक / डेले वाले नमक में सोडियम की मात्रा कम होती है और मैग्नीशियम, कैल्शियम, पोटेशियम आदि का अनुपात सन्तुलित होता है इसलिये यह नमक हल्का, सुपाच्य और शरीर के लिए लाभदायक होता है। हम प्रतिदिन जो अनाज, सब्जियाँ और फल खाते हैं उनमें आजकल भरपूर मात्रा में UREA, DAP के रुप में रासायनिक खाद और विभिन्न प्रकार के कीटनाशक डाले जाते हैं जिसके कारण ये विष हमारे शरीर में जाते हैं और एक अनुमान के अनुसार हम एक वर्ष में लगभग 70 ग्राम विष खा लेते हैं। सेंधा नमक / काला नमक / डेले वाला नमक इस विष को कम करता है और थायराइड, लकवा, मिर्गी आदि रोगों को रोकता है। काला और सेंधा नमक में 84 मिनरल्स होते हैं इसके अलावा इसमें Trace Minerals भी होते हैं इन Trace Minerals के कारण ही सोडियम शरीर को निरोगी बनाता है।
रिफाइण्ड नमक में 98% सोडियम क्लोराइड ही है शरीर इसे विजातीय पदार्थ के रुप में रखता है। यह शरीर में घुलता नही है। इस नमक में आयोडीन को बनाये रखने के लिए Tricalcium Phosphate, Magnesium Carbonate, Sodium Alumino Silicate जैसे रसायन मिलाये जाते हैं जो सीमेंट बनाने में भी इस्तेमाल होते है। विज्ञान के अनुसार यह रसायन शरीर में रक्त वाहिनियों को कड़ा बनाते हैं जिससे ब्लाक्स बनने की संभावना और आक्सीजन जाने मे परेशानी होती है, जोड़ो का दर्द और गढिया, प्रोस्टेट आदि होती है। आयोडीन नमक से पानी की जरुरत ज्यादा होती है। 1 ग्राम नमक अपने से 23 गुना अधिक पानी खींचता है। यह पानी कोशिकाओ के पानी को कम करता है। इसी कारण हमें प्यास ज्यादा लगती है।
अपने आसपास के दुकान वालों से सेंधा नमक या काला नमक या डेले वाला नमक लें अगर उपलब्ध न हो तो बतायें हमारे साथी कार्यकर्ता उपलब्ध करवा सकते हैं।
विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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किसान स्वंय खाद घर में बना सकता है कम से कम खर्च में खादखाद बनाने कि विधि
किसान स्वंय खाद घर में बना सकता है कम से कम खर्च में
खादखाद बनाने कि विधि ।
एक सरल सूत्र बताता हूँ जिसको भारत में पिछले 12-15 वषों में हजारो किसानों ने अपनाया है और बहुत लाभ उनको हुआ है। एक एकड़ खेत के लिए किसी भी फसल के लिए खाद बानाने कि विधि ।
1) एक बार में 15 किलो गोबर लगता है और ये गोबर किसी भी देसी गौमाता या देसी बैल का ही होना चाहियें। विदेशी या जर्सी गायें का नहीं होना चाहियें ।
2) इसमें मिलायें 15 लीटर मूत्र, उसी जानवर का जिसका गोबर लिया है । दोनों मिला लीजिए प्लास्टिक के एक ड्रम में रख दें ।
3) फिर इसमें एक किलो गुड़ डाल दीजिए और गुड़ ऐसा डाल दीजिए जो गुड़ हम नहीं खा सकते, जानवरी नहीं खा सकते, जो बेकार हो गया हो, वो गुड़ खाद बनाने में सबसे अच्छा काम में आता है। तो एक किलो गुड 15 किलो गोमूत्र, 15 किलो गोबर इसमें डालिए ।
4) फिर एक किलो किसी भी दाल का आटा (बेसन) ।
5) अंत में एक किलो मिट्टी किसी भी पीपल या बरगद के पेड़ के नीचे से उठाकर इसमें डालना ।
ये पाँच वस्तुओं को एक प्लास्टिक के ड्रम में मिला देना, डंडे से या हाथ से मिलाने के बाद इसको 15 दिनों तक छावं मे रखना । पन्द्रह दिनों तक इसका सुबह शाम डंडे से घुमाते रहना। पन्द्रह दिनों में ये खाद बनकर तैयार हो जाएगा । फिर इस खाद में लगभग 150 से 200 लीटर पानी मिलाना । पानी मिलाकर अब जो घोल तैयार होगा, ये एक एकड़ के लिए पर्याप्त खाद है। अगर दो एकड़ के लिए पर्याप्त खाद है तो सभी मात्राओं को दो गुणा कर दीजिए।
अब इसको खेत में कैसे डालना है ?
अगर खेत खाली है तो इसको सीधे स्प्रै कर सकते हैं मिट्टी को भिगाने के हिसाब से। डब्बे में भर-भर के छिड़क सकते हैं या स्प्रै पम्प में भरकर छिड़क सकते हैं, स्प्रै पम्प का नोजर निकाल देंगे तो ये छिड़कना आसान होगा ।
फसल अगर खेत में खड़ी हुई है तो फसल में जब पानी लगाएंगे तो पानी के साथ इसको मिला देना है।
खेत मे यह खाद कब-कब डालनी है ?
इसका आप हर 21 दिन में दोबारा से डाल सकते हैं आज आपने डाला तो दोबारा 21 दिन बाद डाल सकते हैं, फिर 21 दिन बाद डाल सकते हैं। मतलब इसका है कि अगर फसल तीन महीने की है तो कम से कम चार-पांच बार डाल दीजिए। चार महीने की है तो पांच से छह बार डाल दीजिए। 6 महीने की फसल है तो सात-आठ बार डाल दीजिए, साल की फसल है तो उसमें आप इसको 14-15 बार डाल दीजिए। हर 21 दिन में डालते जानला है। इस खाद से आप किसी भी फसल को भरपूर उत्पादन ले सकते हैं - गेहूँ, धन, चना, गन्ना, मूंगफली, सब्जी सब तरह की फसलों में ये डालकर देख गया है। इसके बहुत अच्छे और बहुत अदभुत परिणाम हैं।
सबसे अच्छा परिणाम क्या आता है इसका? आपकी जिंदगी का खाद का जो खर्चा है 60 प्रतिशत, वो एक झटके में खत्म हो गया। फिर दूसरा खर्चा क्या खत्म होता हैं जब आप ये गोबर-गोमूत्र का खाद डालेंगे तो खेत में विष कम हो जाएगा, तो जन्तुनाशक डालना और कम हो जाएगा, कीटनाशक डालना ओर कम हो जाएगा। यूरिया, डी.ए.पी. का असर जैसे-जैसे मिट्टी से कम हो जाएगा, बाहर से आने वाले कीट और जंतु भी आपके खेत में कम होते जाएंगें, तो जंतुनाशक और कीटनाशक डालने का खर्च भी कम होता जाएगा, और लगातार तीन-चार साल ये खाद बनाकर आपने डाल दिया तो लगभग तय मानिए आपके खेत में कोर्इ भी जहरीला कीट और जंतु आएगा नहीं, तो उसको मारने के लिए किसी भी दवा की जरूरत नहीं पड़ेगी तो 20 प्रतिशत जो कीटनाशक का खर्चा था वो भी बच जाएगा। खेती का 80 प्रतिशत खर्चा आपका बच जाएगा। दूसरी बात इस खाद के बारे में ये कि ये सभी फसलों के लिए है। जानवरों का गोबर और गोमूत्र गाँव में आसानी से मिल जाता है। गोबर इकटठा करना तो बहुत आसान है। जानवरों का मूत्र इकटठा करना भी आसान है।
देसी गौमाता या देसी बैल का मूत्र कैसे इकटठा करें ?
सभी देसी गौमाता या देसी बैल का मूत्र देते हैं। आप ऐसा करिए कि उनको बांधने का जो स्थान है वो थोड़ा पक्का बना दीजिए, सीमेंट या पत्थर लगा दीजिए और उस स्थान को थोड़ा ढाल दे दीजिए और फिर उसमें एक नाली बना दीजिए और बीच में एक खडडा डाल दीजिए। तो जानवर जो भी मूत्र करेंगे वो सब नाली से आकर खडडे में इकटठा हो जाएगा। अब देसी गौमाता या देसी बैल के मूत्र की एक विशेषता है कि इसकी कोर्इ एक्सपायरी डेट नहीं है। 3 महीने, एक साल, दो साल, पांच साल, दस साल कितने भी दिन पड़ा रहे खडडे में, वो खराब बिल्कुल नहीं होता। इसलिए बिल्कुल निशचिंत तरीके से आप इसका इस्तेमाल करें, मन में हिचक मत लायें कि ये पुराना है या नया। हमने तो ये पाया है कि जितना देसी गौमाता या देसी बैल का मूत्र पुराना होता जाता है उसकी गुन्वत्ता उतनी ही अच्छी होती जाती है। ये जितने भी मल्टीनेशनल कम्पनियों के जंतुनाशक हैं उन सबकी एक्सपायरी डेट है और उसके बाद भी कीड़े मरते नहीं है और किसान उसको कर्इ बार चख कर देखते हैं कि कहीं नकली तो नहीं है, तो किसान मर जाते हैं, कीड़े नहीं मरते हैं तो मल्टीनेशनल कम्पनियों के कीटनाशक लेने से अच्छा है देसी गौमाता या देसी बैल के मूत्र का उपयोग करना। तो इसको खाद में इस्तेमाल करिए, ये एक तरीका है। लगातार तीन-साल इस्तेमाल करने पर आपके खेत की मिट्टी को एकदम पवित्र और शुदध बना देगा, मिट्टी में एक कण भी जहर का नहीं बचेगा। और उत्पादन भी पहले से अधिक होगा । फसल का उत्पादन पहले साल कुछ कम होगा परन्तु खाद का खर्चा एक हि जाटके मे कम हो जायेंगा और उत्पादन भी हर साल बडता जायेगा ।
विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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Monday, August 17, 2015
बीज संस्कार करने के लिए छोटा सा सूत्र
बीज संस्कार करने के लिए छोटा सा सूत्र
बीजबीज संस्कार करने के लिए छोटा सा सूत्र क्या हैं ?
तीसरी जानकारी आपको देना चाहता हूँ कि अच्छी फसल लेने के लिए जो बीज आप खेत में डालते हैं, उस बीज को आप पहले संस्कारित करिए, फिर मिट्टी में डालिए। बीज संस्कार करने के लिए छोटा सा सूत्र बताना चाहता हूँ।
मान लीजिए आपको गेहूँ का बीज लगाना हैं। तो बीज ले लीजिए एक किलो। एक किलो बीज के अनुसार में ये सूत्र बता रहा हूँ। अगर बीज दो किलो है तो सबको दुगुना कर लीजिएगा।
एक किलो किसी भी देसी गौमाता या देसी बैल का गोबर ले लीजिए और उसी देसी गौमाता या देसी बैल का एक किलो मूत्र ले लीजिए। गोबर और मूत्र को आपस में मिला दीजिए। फिर इसमें 100 ग्राम कलर्इ चूना मिलाना है, कलर्इ चूना। चूने का पत्थर बाजार में मिल जाता है आसानी से। उस चूने के पत्थर को एक दिन पहले पानी में डाल दीजिए 2-3 लीटर पानी में। रातभर में को पानी गरम हो जाएगा, फिर वो चूना शांत हो के नीचे बैठ जाएगा। फिर इसको घोल लीजिए। फिर इस 2-3 लीटर चूने वाले पानी को गोबर और गोमूत्र वाले पात्र या बर्तन में डाल दीजिए। तो गोबर-गोमूत्र और सौ ग्राम चूने में जितना घोल तैयार होगा उसमें अच्छे से बीज को डाल दीजिए। कोर्इ भी बीज एक किलो इसमें आराम से भींग जाता है। बीज को इसमें 2-3 घंटे डालकर रखिए। रात में डाल दीजिए, सुबह से निकाल लीजिए। निकालकर इस बीज को छाँव में सूखा दीजिए और छाँव में सूखाने के बाद आप इसको खेत की मिट्टी में लगा दीजिए। तो जो ये बीज लगेगा मिट्टी में, ये संस्कारित हो गया।
इस संस्कारित बीज से क्या फायदे होगा ?
इस संस्कारित बीज के दो फायदे हैं। एक तो फसल पर जल्दी कोर्इ कीट-कीड़ा नहीं लगेगा। तो कीटनाशक-जंतुनाशक से आपको मुक्ति मिल गर्इ, दुसरा फसल का उत्पादन भी अच्छा हो गया। तो बीज संस्कारित करने का एक सूत्र है, कीटनाशक बनाने का एक सूत्र है और खाद बनाने का एक सूत्र हैं, इन तीन बताए गए सूत्रों का भरपूर आप प्रयोग अपने खेत में करिए और अपने किसान मित्रों को ज्यादा से ज्यादा बताइए। मेरा आपसे एक छोटा सा निवेदन है कि इस वर्ष अपने खेत के एक एकड़ में से करके देखिए और एक एकड़ में आपने अगर ये करके देखा तो इसका परिणाम अच्छा आया तो अगले वर्ष पूरे खेत में करिए। और ज्यादा अच्छा आया तो पूरे गाँव के खेत में कराइए, फिर पूरे जिले के खेतों में करा दीजिए। गाँव-गाँव जाकर आप ये गोबर -गोमूत्र का सूत्र किसानों को सिखाना शुरू कर दीजिए, उसी तरह जैसे योग और प्राणायाम सिखाते हैं आप गाँव-गाँव जाकर। तो योग और प्राणायाम से शरीर दुरूस्त हो जाएगा और गोबर-गोमूत्र की खाद से उनका खेत अच्छा हो जाएगा। उनकी मिट्टी अच्छी हो जाएगी, तो सोने पे सुहागे की सिथति बन जाएगी। इधर शरीर स्वस्थ हुआ, उधर मिट्टी स्वस्थ हुर्इ और उसमें से पैदा हुआ अनाज स्वस्थ मिला, उसमें से सबिजयाँ, घास-चारा स्वस्थ मिला। घास चारा जानवर खाएंगें तो दूध बढ़ेगा और उनकी बिमारियाँ कम होगी। हम स्वस्थ भोजन खाएंगे तो हमारी बिमारियाँ कम होगी और डाक्टर का खर्च बचेगां तो सारी जड़मूल से व्यवस्था का परिवर्तन शुरू हो जाएगा, और मेरा ये मानना है कि एक गाँव में अगर एक किसान भार्इ ने भी यदि ये कर लिया तो एक साल के अन्दर पूरा गाँव इसको कर लेगा ।
विश्वजीत सिंह अनन्त
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जैविक कीटनाशक दवाएं किसानों घर में खुद बना सकें वो भी कम से कम खर्च में
जैविक कीटनाशक दवाएं किसानों घर में खुद बना सकें वो भी कम से कम खर्च में
कीटनाशककिसी प्रकार से हम कीटनाशक भी खुद तैयार कर सकते क्या हैं ?
बाजार से किसी विदेशी कम्पनी का 15000 रूपए लीटर का कीटनाशक लाने से अच्छा है इन देसी गौमाता या देसी बैले के मूत्र से ही कीटनाशक बना सकते हैं । अगर किसी फसल में कोर्इ कीट या जंतु लग गया, उसको खत्म करना है, मारना है तो उसके लिए एक सूत्र आप लिख लीजिए कि कीटनाशक बनाना भी बेहद आसान है, कोर्इ भी किसान भार्इ अपने घर में बना सकते हैं ।
कीटनाशक बनाने के लिए क्या करना पड़ता है ?
एक एकड़ खेत के लिए अगर कीटनाशक तैयार करना है तो ः-
1) 20 लीटर किसी भी देसी गौमाता या देसी बैले का मूत्र चाहिए।
2) 20 लीटर मूत्र में लगभग ढार्इ किलो ( आधा किलो कम या ज्यादा हो सकता है ) नीम की पत्ती को पीसकर उसकी चटनी मिलाइए, 20 लीटर मूत्र में। नीम के पत्ते से भी अच्छा होता है नीम की निम्बोली की चटनी ।
3) इसी तरह से एक दूसरा पत्ता होता है धतूरे का पत्ता। लगभग ढार्इ किलो धतूरे के पत्ते की चटनी मिलाइए उसमें।
4) एक पेड़ होता है जिसको आक या आँकड़ा कहते हैं, अर्कमदार कहते हैं आयुर्वेद में। इसके भी पत्ते लगभग ढार्इ किलो लेकर इसकी चटनी बनाकर मिलाए।
5) जिसको बेलपत्री कहते हैं, जिसके पत्र आप शंकर भगवान के उपर चढ़ाते हैं । बेलपत्री या विल्वपत्रा के पते की ढार्इ किलो की चटनी मिलाए उसमें।
6) फिर सीताफल या शरीफा के ढार्इ किलो पतो की चटनी मिलाए उसमें।
7) आधा किलो से 750 ग्राम तक तम्बाकू का पाऊडर और डाल देना।
8) इसमें 1 किलो लाल मिर्च का पाऊडर भी डाल दें ।
9) इसमे बेशर्म के पत्ते भी ढार्इ किलो डाल दें ।
तो ये पांच-छह तरह के पेड़ों के पत्ते आप ले लो ढार्इ- ढार्इ किलो। इनको पीसकर 20 लीटर देसी गौमाता या देसी बैले मूत्र में डालकर उबालना हैं, और इसमें उबालते समय आधा किलो से 750 ग्राम तक तम्बाकू का पाऊडर और डाल देना। ये डालकर उबाल लेना हैं उबालकर इसको ठंडा कर लेना है और ठंडा करके छानकर आप इसको बोतलों में भर ले रख लीजिए। ये कभी भी खराब नहीं होता। ये कीटनाशक तैयार हो गया। अब इसको डालना कैसे है? जितना कीटनाशक लेंगे उसका 20 गुना पानी मिलाएं। अगर एक लीटर कीटनाशक लिया तो 20 लीटर पानी, 10 लीटर कीटनाशक लिया तो 200 लीटर पानी, जितना कीटनाशक आपका तैयार हो, उसका अंदाजा लगा लीजिए आप, उसका 20 गुना पानी मिला दीजिए। पानी मिलकर उसको आप खेत में छिड़क सकते हैं किसी भी फसल पर। इसको छिड़कने का परिणाम ये है कि दो से तीन दिन के अंदर जिस फसल पर आपने स्प्रै किया, उस पर कीट और जंतु आपको दिखार्इ नहीं देगें, कीड़े और जंतु सब पूरी तरह से दो-तीन दिन में ही खत्म हो जाते हैं, समाप्त हो जाते हैं। इतना प्रभावशाली ये कीटनाशक बनकर तैयार होता है। ये बड़ी-बड़ी विदेशी कम्पनियों के कीटनाशक से सैकड़ों गुणा ज्यादा ताकतवर है और एकदम फोकट का है, बनाने में कोर्इ खर्चा नहीं । देसी गौमाता या देसी बैले का मूत्र मुफ्त में मिल जाता है, नीम के पत्ते, निम्बोली, आक के पत्ते, आडू के पत्ते- सब तरह के पत्ते मुफ्त में हर गाँव में उपलब्ध हैं। तो ये आप कीटनाशक के रूप में, जंतुनाशक के रूप में आप इस्तेमाल करें ।
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गौशाला और पंचगव्य उत्पादों के प्रयोग
गौशाला और पंचगव्य उत्पादों के प्रयोग
गाय का विषय राजीव भाई का प्रिय विषय है | क़त्ल खानों में जाने वाली गायों को रोकने के लिए उनके गोबर, गोमूत्र से पंचगव्य उत्पाद बनाकर तथा खेती में प्रयोग होने वाली गोबर खाद व कीट नियंत्रक बनाकर गाय को बचाया जा सकता है और उनकी सेवा की जा सकती है | इस उद्देश्य से एक गौशाला और पंचगव्य उत्पादों का उत्पादन और प्रशिक्षण करने की योजना है और गाँव-गाँव में उनकी जानकारी पहुंचे इसकी तैयारी चल रही है |
आप सभी के साथ से ही यह शुभ कार्य सफल होगा |
इसमें तन, मन, धन का सहयोग अपेक्षित है |
गाय का दूध बहुत ही पौष्टिक होता है। यह बीमारों और बच्चों के लिए बेहद उपयोगी आहार माना जाता है। इसके अलावा दूध से कई तरह के पकवान बनते हैं। दूध से दही, पनीर, मक्खन और घी भी बनाता है। गाय का घी और गोमूत्र अनेक आयुर्वेदिक औषधियां बनाने के काम भी काम आता है। गाय का गोबर फसलों के लिए सबसे उत्तम खाद है। गाय के मरने के बाद उसका चमड़ा, हड्डियां व सींग सहित सभी अंग किसी न किसी काम आते हैं।
अन्य पशुओं की तुलना में गाय का दूध बहुत उपयोगी होता है। बच्चों को विशेष तौर पर गाय का दूध पिलाने की सलाह दी जाती है क्योंकि भैंस का दूध जहां सुस्ती लाता है, वहीं गाय का दूध बच्चों में चंचलता बनाए रखता है। माना जाता है कि भैंस का बच्चा (पाड़ा) दूध पीने के बाद सो जाता है, जबकि गाय का बछड़ा अपनी मां का दूध पीने के बाद उछल-कूद करता है।
गाय न सिर्फ अपने जीवन में लोगों के लिए उपयोगी होती है वरन मरने के बाद भी उसके शरीर का हर अंग काम आता है। गाय का चमड़ा, सींग, खुर से दैनिक जीवनोपयोगी सामान तैयार होता है। गाय की हड्डियों से तैयार खाद खेती के काम आती है।
शारीरिक संरचना : गाय का एक मुंह, दो आंखें, दो कान, चार थन, दो सींग, दो नथुने तथा चार पांव होते हैं। पांवों के खुर गाय के लिए जूतों का काम करते हैं। गाय की पूंछ लंबी होती है तथा उसके किनारे पर एक गुच्छा भी होता है, जिसे वह मक्खियां आदि उड़ाने के काम में लेती है। गाय की एकाध प्रजाति में सींग नहीं होते।
गायों की प्रमुख नस्लें : गायों की यूं तो कई नस्लें होती हैं, लेकिन भारत में मुख्यत: सहिवाल (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, बिहार), गीर (दक्षिण काठियावाड़), थारपारकर (जोधपुर, जैसलमेर, कच्छ), करन फ्राइ (राजस्थान) आदि हैं। विदेशी नस्ल में जर्सी गाय सर्वाधिक लोकप्रिय है। यह गाय दूध भी अधिक देती है। गाय कई रंगों जैसे सफेद, काला, लाल, बादामी तथा चितकबरी होती है। भारतीय गाय छोटी होती है, जबकि विदेशी गाय का शरीर थोड़ा भारी होता है।
भारत में गाय का धार्मिक महत्व : भारत में गाय को देवी का दर्जा प्राप्त है। ऐसी मान्यता है कि गाय के शरीर में 33 करोड़ देवताओं का निवास है। यही कारण है कि दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर गायों की विशेष पूजा की जाती है और उनका मोर पंखों आदि से श्रृंगार किया जाता है।
प्राचीन भारत में गाय समृद्धि का प्रतीक मानी जाती थी। युद्ध के दौरान स्वर्ण, आभूषणों के साथ गायों को भी लूट लिया जाता था। जिस राज्य में जितनी गायें होती थीं उसको उतना ही सम्पन्न माना जाता है। कृष्ण के गाय प्रेम को भला कौन नहीं जानता। इसी कारण उनका एक नाम गोपाल भी है।
निष्कर्ष : कुल मिलाकर गाय का मनुष्य के जीवन में बहुत महत्व है। गाय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तो आज भी रीढ़ है। दुर्भाग्य से शहरों में जिस तरह पॉलिथिन का उपयोग किया जाता है और उसे फेंक दिया जाता है, उसे खाकर गायों की असमय मौत हो जाती है। इस दिशा में सभी को गंभीरता से विचार करना होगा ताकि हमारी 'आस्था' और 'अर्थव्यवस्था' के प्रतीक गोवंश को बचाया जा सके।
विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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कृषि व्यवस्था का स्वदेशीकरण
कृषि व्यवस्था का स्वदेशीकरण
भारतीय खेती१) भारतीय ग्राम समाज में मिलने वाले गोबर, गौमूत्र और अन्य जैविक पदार्थो से सेंद्रीय खाद बनाना चाहिए
फर्टिलाइजर के कारखानों को जो सहूलियत व सबसिडी मिलती है, वह बंद होनी चाहिए । पिछ्ले पचास सालों में रासानिक फर्टिलाइजर को प्रोत्साहित करके सरकार ने भारत की खेती का भारी नुकसान किया है । हमें इस बात का पूरा अनुभव मिल चुका है कि रासायनिक खाद आगे चलकर लंबे समय के लिए नुकसानदेह है और ये जमीन की उर्वरता को खत्म कर देते है । इसलिए ज्यादा खाद डालते हुए भी प्रति एकड़ उत्पादन कम हो रहा है । इसके बदले हमारा गोबर खाद, सेंद्रीय खाद उत्तम है, यह साबित हो चुका है । इसलिए रासायनिक खादों को किसी भी प्रकार का प्रोत्साहन नहीं मिलना चाहिए और सेंद्रीय खाद को तमाम प्रकार के प्रोत्साहन मिलने चाहिए । ताजातरीन शोधों के मुताबिक एक किलो गोबर में से ३० से ३५ किलो जितना ही गुणकारी सेंद्रीय खाद बन सकता है । इस तरह तमाम ग्रामवासियों को अवकाश के समय में सेंद्रीय खाद बनाने में लगाया जाए तो भारत में सेंद्रीय खाद से अत्यंत उपयोगी व समृद्ध हो सकती है । साथ ही इससे जमीन की उर्वरता भी खूब बड़ जायेगी और प्रति एकड़ उत्पादन पूरे विश्व में हम उच्चतम ले सकते है । इतनी बड़ी संभावना हमारे देश में है परंतु उसका उपयोग किया नहीं जाता। ऐसा करने के लिए रासायनिक खाद के ऊपर प्रतिबंध होना चाहिए और एक किलो गोबर से ३० किलो सेंद्रिय खाद बनाने की पध्दति का खूब जोर - शोर से गांव में प्रचार करके ऐसी खाद करोड़ों और अरबों टन बनाने की व्यवस्था करना जरुरी है ।
२) भारतीय ग्राम्य समाज में उपलब्ध गौमूत्र, नीम और दूसरी वनस्पतियों का उपयोग करके कुदरती कीटनाशक दवाएं बनाना और वही खेत में उपयोग करना तथा पेस्टीसाइड्स के कारखाने पर प्रतिबंध
आधुनिक खेती में रासायनिक कीट्नाश्कों ने खेती का सत्यानाश कर रखा है । अभी भारत में हर साल २० हजार करोड़ रु. की कीट्नाशक दवएं किसान उपयोग करता है । यानी किसानों के घरों में से बेशकीमती २० हजार करोड़ रु. के कीटनाशकों के रुप मे चले जाते है । इसलिए किसान बदहाल हो जाता है और बहुत सारे किसानों को आत्महत्या करनी पड़ती है । रासायनिक दवाओं के कारण जमीन का नाश होता है सो अलग और उत्पादन भी कम होता है । कीटनाशक दवाओं बाला खाद्य पदार्थ खाने से तमाम लोगों को कैंसर जैसी बीमारी भी हो जाती है । इसलिए दवाओं में और डाक्टरों पर काफी पैसे खर्च हो जाते है । इस प्रकार के दुश्चक्र में भारत के किसान और भारत की जनता फंस गयी है । कृषि व्यवस्था के स्वदेशीकरण से इस जहरचक्र को तोड़ डालना चाहयें । यह कार्य सचमुच कठिन नहीं है, क्योकि महंगे रासायनिक कीटनाशक दवाओं के बदले स्थानीय बनस्पतियों से घर में कीटनाशक दवाएं बिल्कुल मुफ्त में बना लेना सरल है और हर किसान बहुत कम खर्च में यह कर सकता है । बनस्पतियों से घर में बनने वाली कीटनाशक दवाएं किसानों द्वारा खुद बनाने के तरीके का प्रचार होना चाहिए । यह बहुत जरुरी है । ऐसा हो तो किसान ऐसी दवाएं खुद बनाकर लाखों करोड़ों रुपयों के शोषण से बच सकते है । अपनी खेती की जमीन को खराब होने से बचा सकते है और जनता को कीटनाशक वाली सब्जी, भाजी, अनाज, फल, दलहन से जो कैंसर होता है, उससे बचा सकते है ।
३) पहाड़ों में से मिलने वाले पत्थर तथा अन्य स्थानों से मिलने वाली प्राकृतिक मिट्टी में जो खनिज तत्व है उनका उपयोग कृषि में होना चाहिएं
४) खेती के काम में जरुरी साधन-उपकरण आदि बनाने के लिए लोहार, बढाई वगैरह लोगों को प्रोत्साहन मिले ऐसी नीति
५) भारतीय कृषि परंपराओं में उपयोगी हो ऐसे बीज का संरक्षण और पुनर्गठन
बीज को पवित्र वस्तु मानने की परंपरा भारत में थी । उसकी खरीद-बिक्री नहीं होती थी । मित्र परिवार और सगे- संबंधी से लेन-देन करके आवश्यकताओं की पूर्ति होती थी । अक्सर किसान अपना बीज स्वयम् चुन-चुन कर रखते थे ।
१९६० से हरित क्रांति के दौर में जहां पहले भारत में ४० हजार धान की, चार हजार गेहूं की, एक हजार आम की किस्में थी वे अब बहुराष्टीय कंपनियों को तरजीह देने कारण एक दर्ज तक सिमट गई है । इसलियें हमें अपने पारम्परिक बीजों की सुरक्षा और उत्पादन करने ही होगें ।
६) देशी बीज मिलें ऐसे २५-५० गांवों के समूह में बीज का उत्पादन व वितरण की सुविधा ।
७) खेती का पारंपरिक ज्ञान जो भारतीय किसानों को है, उसका संकलन और प्रचार तथा भारतीय भाषाओं में प्रकाशन ।
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