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Wednesday, March 16, 2016
अरे वहा रे मेरे देश के संविधान !
....अरे वहा रे मेरे देश के नीति निर्धारक और इस देश का इंडियन सम्विधान और यहाँ के नेता सब के सब अंधे-गूंगे हो गए हैं.......
पाकिस्तान क्रिकेटर शाहीद अफरीदी ने भारत की तारीफ क्या कर दी कि पाकिस्तान ने अफरीदी को देशद्रोह का नोटिस दे दिया हैं और सुनो आज भारत के मुस्लिम नेता ओवैसी ने क्या कहा हैं कि मैं कभी भी भारत माता की जय नहीं कहूँगा......
सब चुप हैं क्योंकि यहाँ संविधान में हिन्दू को दूसरे नंबर की नागिरता प्राप्त हैं भारत का कानून यहाँ कुछ नहीं बोलने वाला चाहे देश का कुछ भी हो जाये भारत में तो भारत के खिलाफ बोलने वालो की कमी नहीं, जिस देश का खाते हैं उसी देश को नीचा दिखाते हैं और यहाँ का कानून इतना दोगला हैं की चाहे कितना भी भारत के खिलाफ ज़हर उगले पर यहाँ आजाद होकर रह सकते है, क्योंकि अभी तक कन्हैया को J N U पर सुनते आये हैं और कश्मीर की आज़ादी के नारे भी सुने हैं और कश्मीर में isis के झंडे भी दिखाएँ जाते हैं हम फिर भी चुप हैं पर क्या भारत का पूरा सिस्टम ही ख़राब हैं या कुछ करना नहीं चाहते अगर ऐसा ही रहा तो भारत फिर से गुलाम हो जाएगा......
छोटे- छोटे मुद्दों को उठाकर आन्दोलन करने वाले हिन्दू संगठन भी कभी दृढ़निष्ठा से भारत में हिन्दू समाज को समानता का अधिकार दिलाने का, समान नागरिक संहिता लागू कराने का प्रयास नहीं करते ?
एक तरफ पाकिस्तान हैं वहाँ का कोई भी नागरिक भारत की तारीफ भी कर दे तो उसे जेल हो जाती हैं और देशद्रोह का केश लगा दिया जाता हैं और भारत में इसका उल्टा हैं
आखिर क्यों डरे हो क्या केवल गन्दी राजनीति करनी आती हैं भारत के राजनेताओ को कम से कम दुसरो को देख कर सीख़ लो और ओवैसी तो खुले आम बोलता हैं । फिर भी सब के सब अंधे हैं । सब चुप हैं
महान हैं मेरे देश का कानून और सिस्टम ??
कहने भर के लिए ओवैसी पर कोर्ट केस हो गया तो कुछ लोग बहुत प्रसन्न हो रहे है, उन बेचारों को तो इतना भी नहीं पता नहीं होगा कि इंडियन संविधान में गैर हिन्दुओं को विशेषाधिकार प्राप्त है !
विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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Friday, August 21, 2015
Ancient Indian Education system by Rajiv Dixit
Ancient Indian Education system by Rajiv Dixit
एक जर्मन दार्शनिक हुआ, उसका नाम है मैक्स मुलर. ये मैक्स मुलर ने भारत की शिक्षा व्यवस्था पर सबसे ज्यादा शोध कार्य किया है. और वो ये कहता है कि मै भारत की शिक्षा व्यवस्था से इतना प्रभावित हूँ, शायद ही दुनिया के किसी भी देश में इतनी सुंदर शिक्षा व्यवस्था होगी जो भारत में है और भारत के बंगाल राज्य के बारे में, मैक्स मुलर एक आंकड़ा दे रहा है, कि भारत का जो बंगाल राज्य है, बंगाल प्रान्त है, बंगाल प्रान्त आप जानते है ? भारत का एक प्रान्त है, और ये जब बंगाल की जो ये बात मैक्स मुलर कह रहा है, वो बंगाल है, जिसमे पूरा बिहार है,आधा ओरिसा है, आज का पूरा पश्चिम बंगाल है, और आसाम है, और आसाम के ऊपर के छोटे छोटे सात प्रदेश है. इस बंगाल राज्य के बारे में मैक्स मुलर कह रहा है कि मेरी जानकारी में ८०,००० से अधिक गुरुकुल पुरे बंगाल में सफलता के साथ पिछले हजारो साल से चल रहे है. ८०,००० गुरुकुल, ये मैक्स मुलर ने गिनती करवाई है, और सिर्फ एक राज्य के बारे में, वह एक राज्य है बंगाल.
इसी तरह से एक अंग्रेज विद्वान है, शिक्षाशास्त्री है, उसका नाम है लुद्लो, और लुद्लो आता है भारत में, और करीब सोलह सत्रह साल रहता है इस देश में. और सोलह सत्रह साल रह कर भारत में घुमा है. घुमने के बाद शिक्षा व्यवस्था पर उसने सर्वेक्षण किया है. वो कह रहा है कि भारत में एक भी गाँव ऐसा नहीं है, जहाँ कम से कम एक गुरुकुल नहीं है. कम से कम, माने हर गाँव में कम से कम एक गुरुकुल तो है ही. एक से भी ज्यादा है. फिर वो कह रहा है कि भारत के बच्चे एक भी ऐसे नहीं है जो गुरुकुल में न जाते हों पढाई के लिए, माने सभी बच्चे गुरुकुल में जाते है पढाई के लिए. अब आप पूछेंगे कि ये लुद्लो किस समय की बात कर रहा है, ये लुद्लो १८ वी. सताब्दी की बात कह रहा है. ज्यादा पुरानी बात नहीं कह रहा है. उसके अलावा एक और अंग्रेज है जिसका नाम है जी. डब्लू. लिट्नेर, वो ये कहता है कि मैंने भारत के उत्तर वाले इलाके का पूरा सर्वेक्षण किया है शिक्षा का, और मेरे सर्वेक्षण की रिपोर्ट बताती है कि भारत में २०० लोगों पर एक गुरुकुल चलता है. भारत में २०० लोगों पर एक गुरुकुल चलता है पुरे उत्तर भारत की रिपोर्ट में वो ये निष्कर्ष दे रहा है. और उत्तर भारत का मतलब क्या है, आज का पूरा का पूरा पाकिस्तान, आज का पूरा का पूरा पंजाब, आज का पूरा का पूरा हरियाणा, आज का पूरा का पूरा जम्मू कश्मीर, आज का पूरा हिमांचल प्रदेश. आज का पूरा का पूरा उत्तर प्रदेश, और आज का पूरा उत्तराखंड. ये सारा इलाका मिलकर उत्तर भारत है, और पुरे उत्तर भारत के बारे में लिट्नेर की रिपोर्ट है सन १८२२ की, उसमे वो कहता है, कि २०० लोगों पर कम से कम १ गुरुकुल पूरे उत्तर भारत में है. और इसी तरह से थॉमस मुनरो की रिपोर्ट है, वो ये कह रहा है कि दक्षिण भारत में ४०० लोगों पर कम से कम १ गुरुकुल भारत में है. अब ये उत्तर और दक्षिण को मिला दिया जाए तो सारे भारत के बारे में औसत निकला जाए. तो ये औसत निकलता है कि ३०० लोगों पर कम से कम एक गुरुकुल भारत में है. और जिस ज़माने में ये सर्वेक्षण हुआ है, उस ज़माने में भारत की जनसँख्या लगभग २० करोड़ के आस पास है. तो २० करोड़ की जनसंख्या में ३०० लोगों पर अगर एक गुरुकुल अगर आप निकालेंगे तो कुल २० करोड़ लोगों के ऊपर लगभग ७,३२००० के आस पास गुरुकुल निकलते है. माने सम्पूर्ण भारत देश में लगभग ७,३२००० गुरुकुल है सन. १८२२ के आस पास के ये आंकड़े है. इसका मतलब क्या है? आप और इस बात को हैरानी से समझने की कोशिश करिए कि सन. १८२२ में भारत में ७,३२००० अगर गुरुकुल है, तो गाँव कितने है? तो आपको मालूम है अंग्रेज दस दस वर्ष में भारत की जनसँख्या का सर्वेक्षण करते रहते थे, तो उस ज़माने के सर्वेक्षण से ये पता चला कि भारत में कुल गाँव की संख्या भी लगभग ७,३२००० ही है. माने जितने गाँव है, उतने ही गुरुकुल इस देश में है, माने हर गाँव में पढने के लिए पूरी की पूरी व्यवस्था है, आज की भाषा में कहें तो कम से कम एक स्कूल हर गाँव में है.
इसी रिपोर्ट में आगे चले तो और एक अदभुत बात पता चलती है. कि सन. १८२२ में भारत में तो हर गाँव में एक स्कुल है. तो इंग्लैंड की जरा बात करे, यूरोप की जरा बात करें, कि वहां कितने स्कुल है? और वहां कितने गाँव में कितने स्कुल है कितनी आबादी पे कितने स्कुल है? तो अंग्रेजो के इतिहास के बारे में पता चलता है कि सन. १८६८ तक तो पूरे इंग्लैंड में सामान्य बच्चो को पढ़ाने के लिए एक भी स्कूल नहीं था १८६८ तक,और हमारे यहाँ १८२२ तक पुरे भारत देश में हर गाँव में एक गुरुकुल था, सामान्य बच्चो को पढाने के लिए. मतलब हमारी शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजो से बहुत बहुत बहुत आगे थी. और इसी जी. डब्लू. लिट्नेर रिपोर्ट में में मै आपसे आगे कहू, लिट्नेर कहता है कि सम्पूर्ण भारत देश में ९७ प्रतिशत साक्षरता की दर है, माने ९७ प्रतिशत भारतवासी सुशिक्षित है, साक्षर है. सिर्फ ३ प्रतिशत भारतवासी है जिनको पढने का कोई मौका शायद जीवन में नहीं मिला है. तो ९७ प्रतिशत साक्षरता है हमारे देश में. अब अगर आज के भारत की बात करें, २००९ के भारत की बात करे, तो आपको मालूम है, इस समय भारत में साक्षरता की दर पूरी ताकत लगा कर जब भारत देश में सर्व शिक्षा अभियान चल रहा है, ऊपर से निचे तक हजारों करोडो रूपये खर्च किये जा रहे है, तब हमारे देश में साक्षरता की दर मात्र ५० प्रतिसत पहुँच पाई है. १८२२ में हमारी साक्षरता की दर ९७ प्रतिशत रही है. माने हमारी शिक्षा व्यवस्था आज जो है, इससे कई गुना अच्छी अंग्रेजो के आने से पहले इस देश में रही है.
फिर भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे में एक और अधूत बात है जो सारी दुनिया के लिए जानने योग्य है. भारत की शिक्षा व्यवस्था में क्या है, ये जो गुरुकुल है, इन गुरुकुलों को चलने के लिए कभी किसी राजा से कोई दान या अनुदान नहीं लिया जाता,७,३२००० गुरुकुल इस देश में चलते है और किसी राजा से एक पैसा नहीं लिया जाता. ये सारे गुरुकुल समाज के द्वारा चलाए जाते है. आप बोलेंगे की समाज के द्वारा कैसे चलते है ? हमारे गाँव गाँव में जहाँ जहाँ गुरुकुल रहे है, वहां समाज के लोगों में गुरुकुल के लिए भूमि दान कर रखी है. और उस भूमि पर जितना उत्पादन होता है, उस उत्पादन की आय से गुरुकुल आराम से चलता है. जरुरत पड़े तो गाँव के लोग गुरुकुल के लिए दान इकठ्ठा करते है, और गुरुकुल उसका उपयोग करता है, तो सारे भारत के गुरुकुल साधारण लोगों के दान के पैसे से चलते है, राजा के पैसे से इस देश में एक भी गुरुकुल नहीं चलता है. ये सबसे महत्व की बात है जो सारी दुनिया को जानने के लिए है.
इसके अलावा भारत के गुरुकुलों में समय क्या है पढाई का? तो सूर्योदय से सूर्यास्त का,ये समय है पढाई का. हमारे यहाँ आजकल के जो स्कूल चलते है, वहां का समय है सुबह के १० बजे से दोपहर २ – ३ बजे तक, लेकिन हमारे प्राचीन गुरुकुलों में जो समय है वो सूर्योदय से ले कर सूर्यास्त तक, अब सूर्योदय से ले के सूर्यास्त तक जो विद्यार्थी है, वो क्या क्या पढ़ते है तो उनमे वो १८ विषय पढ़ते है. गणित पढ़ते है, जिसको वैदिक गणित कहा जाता है, खगोल शास्त्र पढ़ते है, नक्षत्र विज्ञान पढ़ते है, धातु विज्ञान पढ़ते है,जिसको आज हम मैट्रोलोजी कहते है, एस्ट्रो फिजिक्स पढ़ते है, केमिस्ट्री माने रसायन शास्त्र पढ़ते है, ऐसे लगभग १८ विषय विद्यार्थिओं को पढाये जाते है. और आपको ऐसा लगता होगा, कई लोगों के मन में ये भ्रम हो जाता है कि भारत में गुरुकुल माने खाली संस्कृत पढाई जाती होगी, और वेद और उपनिषद पढ़ा दिए जाते होंगे. लेकिन यहाँ दस्तावेज बताते है कि भारत में सभी गुरुकुलों में संस्कृत तो पढाई जाती है माध्यम के लिए और वेद पढाए जाते है और उपनिषद पढाये जाते है विद्यार्थियो में संस्कार देने के लिए, लेकिन विद्या देने के लिए खगोल शास्त्र, नक्षत्र विज्ञान, धातु विज्ञान, धातु कला और फिर शौर्य विज्ञान माने सैन्य विज्ञान जिसको हम कहते है, जिसको मिलिट्री ट्रेनिंग कहते है. इस तरह के १८ विषय अलग अलग विद्यार्थियों को पढाये जाते है. फिर इन गुरुकुलों में पढने के लिए विद्यार्थी जब आते है, तो उनकी उम्र कितनी होती है ? तो एक अंग्रेज अधिकारी लिख रहा है, उसका नाम है पेंटर ग्रा वो ये कहता है कि कोई बच्चा, भारत में पांच साल, पांच महीने, और पांच दिन का हो जाता है बस उसी दिन उसका गुरुकुल में प्रवेश हो जाता है. पांच साल, पांच महीने, और पांच दिन का हो जाता है उसी दिन बच्चे प्रवेश का गुरुकुल में हो जाता है. लगातार १४ वर्ष तक वो गुरुकुल में पढता है और १४ वर्ष की शिक्षा पूरी कर के वो गुरुकुल से बाहर निकलता है. तो एक सम्पूर्ण मानव बन के निकलता है. और वो जिम्मेदारी परिवार की उठा सकता है, समाज की उठा सकता है और देश की उठा सकता है. और पेंटर ग्रा कहता है कि शिक्षा भारत में इतनी आसान है कि गरीब हो या अमीर हो, पैसे वाला हो या बिना पैसे वाला हो,सबके लिए शिक्षा सामान है और सबके लिए व्यवस्था सामान है. और आपने तो ये बात बहुत बार सुनी होगी कि हमारे देशो में गुरुकुलों की व्यवस्था ऐसी ही रही है, कि भगवान श्री कृष्ण भी जिस गुरुकुल में पढ़े, उसी गुरुकुल में उनके मित्र सुदामा भी पढ़े. और सुदामा की आर्थिक स्तिथि के बारे में आप जानते है कि भगवान कृष्ण को मुट्ठी भर चावल तक नहीं खिला सकते, इतनी आर्थिक स्तिथि कमजोर है, फिर भी सुदामा को गुरुकुल में प्रवेश मिला है और श्री कृष्ण के साथ बैठ कर उन्होंने शिक्षा ग्रहण की है. माने एक तरफ करोडपति का बेटा, दूसरी तरफ रोडपति का बेटा दोनों एक ही जगह बैठ कर सामान शिक्षा ले रहे है. और गुरु उनको सामान भाव से शिक्षा दे रहा है. भारतीय गुरुकुलों की ये अदभुत विशेषता है. सारी दुनिया के विद्वान् इस बात पर भारत की बहुत प्रशंशा करते है. वो ये कहते है कि भारत की शिक्षा हमेशा से निशुल्क रही है. निशुल्क शिक्षा के कारण गरीब हो या अमीर सबको पढने की व्यवस्था भारत में रही है. माने बहुत ज्यादा पैसा है वो ही पढ़ पाएगा, जिसके पास पैसा नहीं है वो नहीं पढ़ पाएगा, ये भारत के गुरुकुलों में कभी नहीं रहा.
थोड़ा आगे बढ़ता हु, इन गुरुकुलों के आधार पर जो भारत में जो चलता रहा है, वो क्या है, इन गुरुकुलों में विद्यार्थी धातु विज्ञान सीखते है या नक्षत्र विज्ञान सीखते है या खगोल विज्ञान सीखते है या धातुकर्म सीखते है या भवन विज्ञान सीखते है जो कुछ भी सीखते है, और सीख कर निकलते है, शायद वही बड़े बड़े वैज्ञानिक और इंजिनियर हो जाते है. १४ वर्ष की पढाई सामान्य नहीं होती है. आज की आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में अगर हम देखें तो यहाँ १४ वर्ष की पढाई तो जो प्रोफेशनल एजुकेशन है उसी में होती है. यहाँ तो भारत में सामान्य गुरुकुलों में १४ वर्ष की पढाई होती है. और इसके बाद विशेषज्ञता हासिल करनी है, पंडित होना है, पांडित्य आपको लाना है, तो उसके लिए उच्च शिक्षा के केंद्र इस देश में चलते है. जिनको उच्च शिक्षा केंद्र अंग्रेजो ने कहा है, आज उनको हम भारत में यूनिवर्सिटी और कॉलेजेस कह सकते है. आज इस भारत देश में,२००९ में, भारत सरकार के लाखो करोड़ो रूपये खर्च होने के बाद लगभग साढ़े तेरह हजार कॉलेजेस है प्राइवेट और सरकारी सब मिलाकर और ४५० विश्वविद्यालय है, निजी और सरकारी कोनो मिलाकर, साढ़े तेरह हजार कॉलेजेस है और ४५० विश्वविद्यालय है. जब लाखो करोड़ो रूपये सरकार ने खर्च किया है.
अब मै आपको १८२२ के बारे में जानकारी देता हु, कि १८२२ में अकेले मद्रास प्रान्त में,मद्रास प्रेसीडेंसी उसको कहा जाता है. अकेले मद्रास प्रान्त में, मद्रास प्रान्त का मतलब क्या है? आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक का कुछ हिस्सा, ये पूरा मद्रास प्रान्त है. अकेले मद्रास प्रान्त में १८२२ में ११,५७५ कॉलेजेस रहे है और १०९ विश्वविद्यालय रहे है. अकेले मद्रास प्रान्त में, और फिर मद्रास प्रान्त के बाद ऐसे ही मुंबई प्रान्त है, और फिर मुंबई प्रान्त के बाद ऐसे ही पंजाब प्रान्त है. फिर नार्थ – वेस्ट फ्रंटियर है, ये चारो स्थानों को मिला दिया जाये तो भारत में लगभग १४००० से भी ऊपर कॉलेजेस रहे है और लगभग ५०० से सवा ५०० के बीच में विश्वविद्यालय रहे है. अब विश्वविद्यालय आज से ज्यादा, कॉलेजेस भी आज से ज्यादा, सन १८२२ में भारत की ये स्थिति है, माने उच्च शिक्षा भारत में अदभुत रही है, अंग्रेजो के आने के पहले तक, माध्यमिक शिक्षा तो अदभुत है ही, प्राथमिक शिक्षा भी बहुत अदभुत है लेकिन उच्च शिक्षा भी इस देश में अदभुत है. और इन कॉलेजेस में विशेष रूप से जो कॉलेजेस रहे है, अभियांत्रिकी के अलग कॉलेजेस है, इंजीनियरिंग के अलग कॉलेजेस है, सर्जरी के अलग कॉलेज है,मेडिसिन के अलग कॉलेज है. जिनको आज हम कहते है न मेडिकल कॉलेज अलग है,इंजीनियरिंग कॉलेज अलग है. मैनेजमेंट के कॉलेज अलग है, ये तो भारत में १८२२ में भी है, सर्जरी के विश्वविद्यालय अलग है. और ये हमारे चिकित्सा विज्ञान में जिसको हम आयुर्वेद कहते है, इसके विश्वविद्यालय अलग है, और मैनेजमेंट के विश्वविद्यालय अलग है. ये पुरे भारत में फैले हुए है और पुरे भारत के विद्यार्थियो की व्यवस्था यहाँ पर है. हमने सुना है तक्षशिला एक विश्वविद्यालय कभी होता था, हमने सुना है कभी नालंदा नाम का एक विश्वविद्यालय होता था. ये तक्षशिला नालंदा तो दो नाम है ऐसे तो ५०० से ज्यादा विश्वविद्यालय सम्पूर्ण भारत देश में हमारे आज से लगभग डेढ़ सौ– पोने दो सौ तक रहे है. तक्षशिला नालंदा तो आज से ढाई हजार साल पहले की कहानी है. लेकिन डेढ़ सौ पोने दो सौ साल पहले के भारत में सवा पांच सौ से ज्यादा विश्वविद्यालय है और १४००० के आस पास डिग्री कॉलेजेस है. तो शिक्षा व्यवस्था में भारत मजबूत है पूरी दुनिया में. आपको एक हंसी की बात मै कहू वो ये कि पुरे यूरोप में ऐसा माना जाता है कि सबसे पहले शिक्षा व्यवस्था सामान्य लोगों के लिए इंग्लैंड में आई. और वो सन. १८६८ में आई. इसका माने यूरोप के देशो में में तो उसके और बाद में आई. तो आप बोलेंगे १८६८ के पहले इंग्लैंड में स्कूल नहीं थे? स्कूल नहीं थे, ये बात को सही तरह से समझना है, राजाओं के जो बच्चे जो होते थे, राजाओं के जो अधिकारी होते थे, उन्ही के लिए स्कूल होते थे. और वो राजाओं के महल में चला करते थे, वो सामान्य रूप से सार्वजनिक स्थानों पर नहीं चला करते थे. और साधारण लोगों को उनमे प्रवेश भी नहीं था, इंग्लैंड और यूरोप में ये माना जाता था कि शिक्षा जो है वो विशेषज्ञो के लिए है. और राजा विशेषज्ञ है तो राजा को शिक्षा है, उसके बच्चों को शिक्षा है, उसके अधिकारियो के बच्चों को शिक्षा है. आम आदमी को शिक्षित होने की जरूरत नहीं है. क्यों? तो यूरोप के दार्शनिक कहते है कि आम आदमी को तो गुलाम बन के रहना है, उसको शिक्षित होने से फायदा क्या है. दुनिया में बहुत बड़ा दार्शनिक माना जाता है अरस्तू और उससे भी बड़ा माना जाता है सुकरात. अरस्तू और सुकरात दोनों कहते है कि अन्य बच्चों को शिक्षा नहीं देनी चाहिए, शिक्षा सिर्फ राजा के बच्चों को,राजा के अधिकारियो के बच्चों को ही देनी चाहिए, तो उनके लिए कुछ पढने और पढ़ाने की व्यवस्था है, आम बच्चों के लिए नहीं है. जबकि भारत में बिलकुल उलटा है. शिक्षा आम बच्चों के लिए है, साधारण बच्चों के लिए है, वो गरीब हो, या अमीर हो, ऐसी अदभुत शिक्षा व्यवस्था हमारे देश में रही है.
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परस्पर विरुध्द आहार
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राजीव भाई
1 दूध और कटहल का कभी भी एक साथ सेवन नहीं करना चाहिये ।
2. दूध और कुलत्थी भी कभी एक साथ नहीं लेना चाहिए।
3. नमक और दूध (सेंधा नमक छोड़कर) दूध और सभी प्रकार की खटाइयां, दूध और मूँगफली, दूध और मछली, एक साथ प्रयोग ना करें।
4. दही गर्म करके नहीं खाना चाहिये हानि पहुँचती है, कढ़ी बनाकर खा सकते हैं।
5. शहद और घी समान परिणाम में मिलाकर लेना विष के समान है।
6. जौ का आटा कोर्इ अन्न मिलाये बिना नहीं लेना चाहिए।
7. रात्रि के समय सत्तू का प्रयोग वर्जित है, बिना जल मिलाये सत्तू ना खायें।
8. तेज धूप में चलकर आने के बाद थोड़ा आराम करके ही पानी पियें, व्यायाम या शारीरिक परिश्रम के तुरन्त बाद पानी ना पियें या थोड़ी देर बाद पानी पियें और भोजन के प्रारम्भ में पानी पीना वर्जित है।
9. प्रात:काल भोजन के पश्चात तेज गति से चलना हानिकारक है।
10. शाम को खाने के बाद थोड़ी देर चलना आवश्यक है, खाना खाकर तुरन्त सो जाना हानिकारक है।
11. रात्रि में दही का सेवन निषेध है, भोजन के तुरन्त बाद जल का सेवन निषेध है। दिन में भोजन के बाद मठ्ठा और रात्रि में भोजन के बाद दूध लेना लाभदायक होता है। वात के रोगों में ब्लड एसिडिटी, कफ वृद्धि या संधिवात में दही ना खायें।
12. शौच क्रिया के बाद, भोजन से पहले, सर्दी-जुकाम होने पर, दांतों में पीव आने पर और पसीना आने की दशा में पान का सेवन नहीं करना चाहिए।
13. सिर पर अधिक गर्म पानी डालकर स्नान करने से नेत्रों की ज्योति कम होती है जरूरत पड़ने पर गुनगुने पानी से स्नान कर सकते हैं।
14. सोते समय सिर पर कपड़ा बांधकर सोना, पैरों में मोजे पहनकर सोना, अधिक चुस्त कपड़े पहनकर सोना हानिकारक है।
15. शहद कभी भी गर्म करके ना खायें, छोटी मधुमक्खी का शहद सर्वोत्तम होता है।
16. तेज ज्वर आने पर तेज हवा, दिन में अधिक देर तक सोना, अधिक परिश्रम, स्नान, क्रोध आदि से बचना चाहिये।
17. नींद लेने से पित्त घटता है, मालिश से वात कम होता है और उल्टी करने से कफ कम होता है एवं उपवास करने से ज्वर शांत होता है।
विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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पित्त प्रकृति वाले व्यकित के लक्षण
पित्त प्रकृति वाले व्यकित के लक्षण
पित्त
1. शारीरिक गठन - नाजुक शिथिल शरीर होता है इन्हें गर्मी सहन नहीं होती ।
2. वर्ण - पीला
3. त्वचा - त्वचा पीली एवं नर्म होती है फुंसियों और तिलों से भरी हुर्इ, अंग शिथिल; हथेलियाँ, होठ, जीभ, कान आदि लाल रहते हैं ।
4. केश - बालों का छोटी उम्र में सफेद होना व झड़ना, रोम बहुत कम होना ।
5. नाखून - नाखून लाल
6. आंखें - लाल
7. जीभ - लाल
8. आवाज - स्पष्ट, श्रेष्ठ वक्ता
9. मुंह - कण्ठ सूखता है ।
वात,पित्त और काफ
10. स्वाद - मुंह का स्वाद कड़वा रहना, कभी-कभी खट्टा होना, मुंह व जीभ में छाले होना ।
11. भूख - भूख अधिक लगती है, बहुत सा भोजन करने वाला होता है, पाचन शक्ति अच्छी होती है ।
12. प्यास - प्यास अधिक लगती है ।
13. मल - मल का अधिक पतला व पीला होना, जलनयुक्त होना, दस्त की प्रवृत्ति ।
14. मूत्र - मूत्र कभी गहरा पीला होना, कभी लाल होना, मूत्र में जलन होना ।
15. पसीना - पसीना बहुत कम आना, गर्म और दुर्गन्धयुक्त पसीना ।
16. नींद - निद्रानाश ।
17. स्वप्न - अग्नि, सोना, बिजली, तारा, सूर्य, चन्द्रमा आदि चमकीले पदार्थ देखना ।
18. चाल - साधारण किन्तु लक्ष्य की ओर अग्रसर चाल वाला होता है ।
19. पसन्द - गर्मी बुरी लगती है और अत्यधिक सताती है, गर्म प्रकृति वाली चीजें पसंद नहीं आती, धूप और आग पसंद नहीं, शीतल वस्तुयें यथा-ठंडा जल, बर्फ, ठण्डे जल से स्नान, फूलमाला आदि प्रिय लगते हैं, कसैले, चरपरे और मीठे पदार्थ प्रिय लगते हैं ।
20. नाड़ी की गति - कूदती हुर्इ (मेढ़क या कौआ की चाल वाली), उत्तेजित व भारी नाड़ी होना ।
विश्वजीत सिंह अनन्त
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वात प्रकृति वाले व्यकित के लक्षण
वात प्रकृति वाले व्यकित के लक्षण
वात
1. शारीरिक गठन - वात प्रकृति का शरीर प्राय: रूखा, फटा-कटा सा दुबला-पतला होता है, इन्हें सर्दी सहन नहीं होती।
2. वर्ण - अधिकतर काला रंग वाला होता है ।
3. त्वचा - त्वचा रूखी एवं ठण्डी होती है फटती बहुत है पैरों की बिवाइयां फटती हैं हथेलियाँ और होठ फटते हैं, उनमें चीरे आते हैं अंग सख्त व शरीर पर उभरी हुर्इ बहुत सी नसें होती हैं ।
4. केश - बाल रूखे, कड़े, छोटे और कम होना तथा दाढ़ी-मूंछ का रूखा और खुरदरा होना ।
5. नाखून - अंगुलियों के नाखूनों का रूखा और खुरदरा होना ।
6. आंखें - नेत्रों का रंग मैला ।
7. जीभ - मैली
8. आवाज - कर्कश व भारी, गंभीरता रहित स्वर, अधिक बोलता है ।
9. मुंह - मुंह सूखता है ।
10. स्वाद - मुंह का स्वाद फीका या खराब मालूम होना ।
वात,पित्त और काफ
11. भूख - भूख कभी ज्यादा कभी कम, पाचन क्रिया कभी ठीक रहती है तो कभी कब्ज हो जाती है, विषम अग्नि, वायु बहुत बनती है ।
12. प्यास - कभी कम, कभी ज्यादा ।
13. मल - रूखा, झाग मिला, टूटा हुआ, कम व सख्त, कब्ज की प्रवृत्ति ।
14. मूत्र - मूत्र का पतला जल के समान होना या गंदला होना, मूत्र में रूकावट की शिकायत होना ।
15. पसीना - कम व बिना गन्ध वाला पसीना ।
16. नींद - नींद कम आना, ज्यादा जम्हाइयां आना, सोते समय दांत किटकिटाने वाला ।
17. स्वप्न - आकाश में उड़ने के सपने देखना ।
18. चाल - तेज चलने वाला होता है ।
19. पसन्द - नापसन्द - सर्दी बुरी लगती है, शीतल वस्तुयें अप्रिय लगती हैं, गर्म वस्तुओं की इच्छा अधिक होती है मीठे, खटटे, नमकीन पदार्थ विशेष प्रिय लगते हैं ।
20. नाड़ी की गति - टेढ़ी-मेढ़ी (सांप की चाल के समान) चाल वाली प्रतीत होती है, तेज और अनियमित नाड़ी ।
विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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कफ प्रकृति वाले व्यकित के लक्षण
कफ प्रकृति वाले व्यकित के लक्षण
कफ
1. शारीरिक गठन - सुडौल, चिकना, मोटा शरीर होता है, इन्हें सर्दी कष्ट देती है ।
2. वर्ण - गोरा
3. त्वचा - चिकनी, पानी से गीली हुर्इ सी नम होती है, अंग सुडौल और सुन्दर
4. केश - घने, घुंघराले, काले केश होना ।
5. नाखून - नाखून चिकने
6. आंखें - सफेद
7. जीभ - सफेद रेग के लेप वाली
8. आवाज - मधुर बोलने वाला
9. मुंह - मुंह या नाक से बलगम अधिक निकलता है ।
10. स्वाद - मुंह का स्वाद मीठा-मीठा सा रहना, कभी लार का बहना ।
वात,पित्त और काफ
11. भूख - भूख कम लगती है, अल्प भोजन से तृप्ति हो जाती है, मन्दागिन रहती है ।
12. प्यास - प्यास कम लगती है ।
13. मल - सामान्य ठोस मल, मल में चिकनापन या आंव का आना ।
14. मूत्र - सफेद सा, मूत्र की मात्रा अधिक होना, गाढ़ा व चिकना होना ।
15. पसीना - सामान्य पसीना, ठंडा पसीना ।
16. नींद - नींद अधिक आना, आलस्य और सुस्ती आना ।
17. स्वप्न - नदी, तालाब, जलाशय, समुद्र आदि देखना ।
18. चाल - धीमी, स्थिर (एक जैसी) चाल वाला होता है ।
19. पसन्द - सर्दी बुरी लगती है और बहुत कष्ट देती है, धूप और हवा अच्छी लगती है, नम मौसम में भय लगता है, गरमा गरम भोजन और गर्म पदार्थ प्रिय लगते हैं, गर्म चिकने चरपरे और कड़वे पदार्थों की इच्छा अधिक होती है ।
20. नाड़ी की गति - मन्द-मन्द (कबूतर या मोर की चाल वाली), कमजोर व कोमल नाड़ी।
विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
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रक्ताल्पता (खुन की कमी)
रक्ताल्पता (खुन की कमी)
राजीव भाई
प्राणायाम और योग करें।
प्रात: का भोजन :-
1) 1 गिलास गाजर का रस + 1 आँवला या नींबू डालकर
2) रात में भिगोर्इ किशमिश (10ग्राम) + चना + 5 खजूर खाना ।
3) टमाटर का जूस पीना ।
4) चावल का माड़ पीना ।
5) मूली का रस + सेंधा नमक मिलाकर
6) गन्ने का रस
दोहपर का भोजन :-
1) चुकंदर + मूली + टमाटर (1-1) सलाद खाना
2) पालक , मेथी, बथुआ की सब्जी
शाम का भोजन :-
1) हर प्रकार का सलाद
2) सामान्य भोजन
3) दूध मे 1 चम्मच शतावरी चूर्ण मिलाकर पियें ।
पथ्य :- चावल, मूंग, मसूर, गोमूत्र, हरिद्रा, मधु, घी, छाछ, हरड़, शुष्ठी, पालक, चौलार्इ, मेथी, गाजर, लहसुन
अपथ्य :- मैदे वाले और पीठी वाले पदार्थ (कचौड़ी, बड़ा, बेकरी उत्पाद)
रोग मुक्ति के लिये आवश्यक नियम :
पानी के सामान्य नियम :
१) सुबह बिना मंजन/कुल्ला किये दो गिलास गुनगुना पानी पिएं ।
२) पानी हमेशा बैठकर घूँट-घूँट कर के पियें ।
३) भोजन करते समय एक घूँट से अधिक पानी कदापि ना पियें, भोजन समाप्त होने के डेढ़ घण्टे बाद पानी अवश्य पियें ।
४) पानी हमेशा गुनगुना या सादा ही पियें (ठंडा पानी का प्रयोग कभी भी ना करें।
भोजन के सामान्य नियम :
१) सूर्योदय के दो घंटे के अंदर सुबह का भोजन और सूर्यास्त के एक घंटे पहले का भोजन अवश्य कर लें ।
२) यदि दोपहर को भूख लगे तो १२ से २ बीच में अल्पाहार कर लें, उदाहरण - मूंग की खिचड़ी, सलाद, फल और छांछ ।
३) सुबह दही व फल दोपहर को छांछ और सूर्यास्त के पश्चात दूध हितकर है ।
४) भोजन अच्छी तरह चबाकर खाएं और दिन में ३ बार से अधिक ना खाएं ।
अन्य आवश्यक नियम :
१) मिट्टी के बर्तन/हांडी मे बनाया भोजन स्वस्थ्य के लिये सर्वश्रेष्ठ है ।
२) किसी भी प्रकार का रिफाइंड तेल और सोयाबीन, कपास, सूर्यमुखी, पाम, राईस ब्रॉन और वनस्पति घी का प्रयोग विषतुल्य है । उसके स्थान पर मूंगफली, तिल, सरसो व नारियल के घानी वाले तेल का ही प्रयोग करें ।
३) चीनी/शक्कर का प्रयोग ना करें, उसके स्थान पर गुड़ या धागे वाली मिश्री (खड़ी शक्कर) का प्रयोग करें ।
४) आयोडीन युक्त नमक से नपुंसकता होती है इसलिए उसके स्थान पर सेंधा नमक या ढेले वाले नमक प्रयोग करें ।
५) मैदे का प्रयोग शरीर के लिये हानिकारक है इसलिए इसका प्रयोग ना करें ।
विश्वजीत सिंह अनन्त
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