Monday, August 29, 2016

जाति और वर्ण में क्या अंतर है?

जाति का अर्थ है उद्भव के आधार पर किया गया वर्गीकरण। न्याय सूत्र में लिखा है समानप्रसवात्मिका जाति: -न्याय दर्शन[vi] अर्थात जिनके प्रसव अर्थात जन्म का मूल सामान हो अथवा जिनकी उत्पत्ति का प्रकार एक जैसा हो वह एक जाति कहलाते है।

आकृतिर्जातिलिङ्गाख्या-न्याय दर्शन[vii] अर्थात जिन व्यक्तियों कि आकृति (इन्द्रियादि) एक समान है, उन सबकी एक जाति है।
हर जाति विशेष के प्राणियों के शारीरिक अंगों में एक समानता पाई जाती है। सृष्टि का नियम है कि कोई भी एक जाति कभी भी दूसरी जाति में परिवर्तित नहीं हो सकती है और न ही भिन्न भिन्न जातियाँ आपस में संतान को उत्त्पन्न कर सकती है। इसलिए सभी जातियाँ ईश्वर निर्मित है नाकि मानव निर्मित है। सभी मानवों कि उत्पत्ति, शारीरिक रचना, संतान उत्पत्ति आदि एक समान होने के कारण उनकी एक ही जाति हैं और वह है मनुष्य।

वर्ण – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के लिए प्रयुक्त किया गया “वर्ण” शब्द का प्रयोग किया जाता है। वर्ण का मतलब है जिसका वरण किया जाए अर्थात जिसे चुना जाए। वर्ण को चुनने का आधार गुण, कर्म और स्वभाव होता है। वर्णाश्रम व्यवस्था पूर्ण रूप से वैदिक है एवं इसका मुख्य प्रयोजन समाज में मनुष्य को परस्पर सहयोगी बनाकर भिन्न भिन्न कामों को परस्पर बाँटना, किसी भी कार्य को उसके अनुरूप दक्ष व्यक्ति से करवाना, सभी मनुष्यों को उनकी योग्यता अनुरूप काम पर लगाना एवं उनकी आजीविका का प्रबंध करना है।

आरम्भ में सकल मनुष्य मात्र का एक ही वर्ण था[viii], लौकिक व्यवहारों कि सिद्धि के लिए कामों को परस्पर बांट लिया। यह विभाग करने कि प्रक्रिया पूर्ण रूप से योग्यता पर आधारित थी। कालांतर में वर्ण के स्थान पर जाति शब्द रूढ़ हो गया। मनुष्यों ने अपने वर्ण अर्थात योग्यता  के स्थान पर अपनी अपनी भिन्न भिन्न जातियाँ निर्धारित कर ली। गुण, कर्म और स्वभाव के स्थान पर जन्म के आधार पर अलग अलग जातियों में मनुष्य न केवल विभाजित हो गया अपितु एक दूसरे से भेदभाव भी करने लगा। वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था के स्थान छदम एवं मिथक जातिवाद ने लिया।

भारत का इस्लामीकरण क्यों?

पाकिस्तान मिलने के बाद मुसलमानों ने नारा दिया : ''हँस के लिया है पाकिस्तान, लड़ लेंगे हिन्दुस्तान''। इसीलिए १९४७ से ही भारत में इस्लामी जिहाद जारी है जिसमें प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तानी एवं भारतीय मुसलमान सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। देखिए कुछ प्रमाण-
(i) हकीम अजमल खां ने कहा- ''एक और भारत और दूसरी ओर एशिया माइनर भावी इस्लामी संघ रूपी जंजीर की दो छोर की कड़िया हैं जो धीर-धीरे, किन्तु निश्चय ही बीच के सभी देशों को एक विशाल संघ में जोड़ने जा रही हैं'' (भाषण का अंश खिलाफत कान्फ्रेस अहमदाबाद १९२१, आई.ए.आर. १९९२, पृ. ४४७)
(ii) कांग्रेस नेता एवं भूतपूर्व शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद ने पूरे भारत के इस्लामीकरण की वकालत करते हुए कहा- ''भारत जैसे देश को जो एक बार मुसलमानों के शासन में रह चुका है, कभी भी त्यागा नहीं जा सकता और प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है कि उस खोई हुई मुस्लिम सत्ता को फिर प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करें'' बी.आर. नन्दा, गाँधी पेन इस्लामिज्म, इम्पीरियलज्म एण्ड नेशनलिज्म पृ. ११७)
(iii) एफ. ए. दुर्रानी ने कहा- ''भारत-सम्पूर्ण भारत हमारी पैतृक सम्पत्ति है उसका फिर से इस्लाम के लिए विजय करना नितांत आवश्यक है तथा पाकिस्तान का निर्माण इसलिए महत्वपूर्ण था कि उसका शिविर यानी पड़ाव बनाकर शेष भारत का इस्लामीकरण किया जा सके।'' (पुरुषोत्तम, मुस्लिम राजनीतिक चिन्तन और आकांक्षाएँ, पृ. ५१,५३)
(iv) मौलाना मौदूदी का कथन है कि ''मुस्लिम भी भारत की स्वतंत्रता के उतने ही इच्छुक थे जितने कि दूसरे लोग। किन्तु वह इसकी एक साधन, एक पड़ाव मानते थे, ध्येय (मंजिल) नहीं। उनका ध्येय एक ऐसे राज्य की स्थापना का था जिसमें मुसलमानों को विदेशी अथवा अपने ही देश के गैर-मुस्लिमों की प्रजा बनकर रहना न पड़े। शासन दारूल-इस्लाम (शरीयः शासन) की कल्पना के, जितना सम्भव हो, निकट हो। मुस्लिम, भारत सरकार में, भारतीय होने के नाते नहीं, मुस्लिम हैसियत से भागीदार हों।'' (डॉ. ताराचन्द्र, हिस्ट्री ऑफ दी फ्रीडम मूवमेंट, खंड ३, पृ. २८७)
(v) हामिद दलवई का मत है कि ''आज भी भारत के मुसलमानों और पाकिस्तान में भी प्रभावशाली गुट हैं, जिनकी अन्तिम मांग पूरे भारत का इस्लाम में धर्मान्तरण है''। (मुस्लिम डिलेमा इन इंडिया, पृ. ३५)
(vi) बंगालदेश के जहांगीर खां ने ''बंगला देश, पाकिस्तान, कश्मीर तथा पश्चिमी बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब व हरियाणा के मुस्लिम-बहुल कुछ भागों को मिलाकर मुगलियास्थान नामक इस्लामी राष्ट्र बनने का सपना संजोया है।'' (मुसलमान रिसर्च इंस्टीट्‌यूट, जहांगीर नगर, बंगलादेश, २०००)

(vii) सउदी अरेबिया के प्रोफेसर नासिर बिन सुलेमान उल उमर का कथन है कि ''भारत स्वयं टूट रहा है। यहाँ इस्लाम तेज गति से बढ़ रहा है और हजारो मुसलमान, पुलिस, सेना और राज्य शासन व्यवस्था में घुस चुके हैं और भारत में इस्लाम सबसे बड़ा दूसरा धर्म है। आज भारत भी विध्वंस के कगार पर है। जिस प्रकार किसी राष्ट्र को उठने में दसियों वर्ष लगते हैं उसी प्रकार उसके ध्वंस होने में भी लगते हैं। भारत एकदम रातों-रात समाप्त नहीं होगा। इसे धीरे-धीरे समाप्त किया जाएगा। निश्चय ही भारत नष्ट कर दिया जाएगा।'' (आर्गे; १८.७.०४)। इसीलिए मुस्लिम धार्मिक नेता मौलाना वहीदुद्‌दीन ने सुझाव दिया कि ''मुसलमानों को कांग्रेस में शामिल हो जाना चाहिए और आगे चलकर उनमें से एक निश्चय ही भारत का प्रधान मंत्री हो जाएगा।'' (हिन्दु. टा. २५.१.९६) (हिन्दु. टा. २५.१.९६)
पाकिस्तानी जिहादियों का उद्‌देश्य भी अगस्त १९४७ का अधूरा कार्यक्रम पूरा करना है यानी पहले कश्मीर और फिर शेष भारत को इस्लामी राज्य बनाना। इसके लिए न केवल जिहादी संगठनों बल्कि आई.एस.आई. और तालिबान व पाकिस्तानी सेना का भी समर्थन है क्योंकि भूतपूर्व राष्ट्रपति जिया उल हक ने ''पाकिस्तानी सेना को 'अल्लाह के लिए जिहाद' (जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह) का 'मोटो' या 'आदर्श वाक्य' दिया था। (एस. सरीन, दी जिहाद फैक्ट्री पृ. ३२१)
जिहादियों के उद्‌देश्य को स्पष्ट करते हुए मरकज दवाल वल इरशाद के अमीर हाफिज़ मुहम्मद सईद ने कहाः ''कश्मीर को भारत से मुक्त कराने के बाद लश्करे तायबा वहीं नहीं रुकेगा बल्कि भारतीय मुसलमानों, जिन पर हिन्दुओं द्वारा अत्याचार हो रहे हैं, के सहयोग से आगे जाएगा और उन्हें बचाएगा। कश्मीर तो, असली लक्ष्य भारत तक पहुँचने का दरवाजा है।'' (नेशन, ४.११.१९९८)। उन्होंने ७.११.१९९८ को 'पाकिस्तान टाइम्स' में लिखाः ''आखिर में लश्करे टाइबा दिल्ली, तेल अवीब (इज्राइल) और वाशिंगटन के ऊपर झंडा फहराएगा।'' उन्होंने २७ नवम्बर १९९८ को फिर 'फ्राइडे टाइम्स' में लिखाः ''मुस्लिम समाज की सभी समस्याओं का हल जिहाद है क्योंकि सभी इस्लाम विरोधी ताकतें मुसलमानों के विरुद्ध जुट गई हैं। मुजाहिद्‌्‌दीन भारतीय क्रूरताओं, जो कि निरपराधी कश्मीरियों को भयभीत कर रहे हैं; के विरुद्ध जिहाद कर रहे हैं। लश्कर के मुजाहिद्‌दीन, विश्व भर में आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।'' इसी लहजे में उन्होंने १८.०८.२००४ को 'निदा ए मिललक्त' में लिखा ''वास्तव में पाकिस्तान तो इस महाद्वीप के मुसलमानों के लिए एक देश है। इसीलिए यह कश्मीर बिना अधूरा है। पाकिस्तान भी हैदराबाद, जूनागढ़ और मुम्बई (महाराष्ट्र) के बिना अधूरा है क्योंकि इन राज्यों ने (१९४७ में) पाकिस्तान में विलय की घोषणा की थी। लेकिन हिन्दुओं के कब्जे से मुक्त कराऐं, और उनकी मुस्लिम आबादी को यह आश्वासन दिया जाएगा कि वे पाकिस्तान के पूर्ण होने के लिए हमारा यह लक्ष्य है। हम भारत में वाणी और कलम से यह उद्‌देश्य प्रचारित करते रहेंगे और जिहाद द्वारा उन राज्यों को वापिस लेंगे।'' (सरीन, वही. पृ. ३१२) शायद इसीलिए पाकिस्तानी जिहादियों ने २६.११.२००८ को बम्बई पर हमला किया था। साथ ही यह ऐतिहासिक सत्य है कि १९४७ में सभी राज्यों ने स्वेच्छा से भारत में विलय किया था।
जैसे मुहम्मद के अध्यक्ष मौलाना मसूद अजहर, जिन्हें २००० में कंधार में हवाई जहाज में बन्धक बनाए १६० यात्रियों के बदले छोड़ा गया था, ने हाजरों लोगों की उपस्थिति में कहाः ''भारतीयों और उनको बतलाओ, जिन्होंने मुसलमानों को सताया हुआ है, कि मुजाहिद्‌दीन अल्लाह की सेना है और वे जल्दी ही इस दुनिया पर इस्लाम का झंडा महराएंगे। मैं यहाँ केवल इसलिए आया हूँ कि मुझे और साथी चाहिए। मुझे मुजाहिद्‌दीनों की जरूरत है जो कि कश्मीर की मुक्ति के लिए लड़ सकें। मैं तब तक शान्ति से नहीं बैठूंगा जब तक कि मुसलमान मुक्त नहीं हो जाते। इसलिए (ओ युवकों) जिहाद के लिए शादी करो, जिहाद के लिए बच्चे पैदा करो और केवल जिहाद के लिए धन कमाओ जब तक कि अमरीका और भारत की क्रूरता समाप्त नहीं हो जाती। लेकिन पहले भारत।'' (न्यूज ८.१.२०००)

परिवार और दोस्त

जंगली भैंसों का एक झुण्ड
जंगल में घूम रहा था...
.
तभी एक बछड़े ने पुछा...
पिता जी, क्या इस जंगल में
ऐसी कोई चीज है जिससे
डरने की ज़रुरत है ?
.
बस शेरों से सावधान रहना..
भैंसा बोला...
.
हाँ , मैंने भी सुना है कि शेर
बड़े खतरनाक होते हैं...
.
अगर कभी मुझे शेर दिखा
तो मैं जितना हो सके उतनी
तेजी से दौड़ता हुआ भाग
जाऊँगा... बछड़ा बोला .
.
नहीं.. इससे बुरा तो तुम
कुछ कर ही नहीं सकते..
भैंसा बोला
.
बछड़े को ये बात कुछ
अजीब लगी..वह बोला...
.
क्यों ? वे खतरनाक होते हैं...
मुझे मार सकते हैं तो भला
मैं भाग कर अपनी जान
क्यों ना बचाऊं ?
.
भैंसा समझाने लगा....
अगर तुम भागोगे तो शेर
तुम्हारा पीछा करेंगे....
.
भागते समय वे तुम्हारी
पीठ पर आसानी से हमला
कर सकते हैं और तुम्हे नीचे
गिरा सकते हैं …
.
और एक बार तुम गिर गए
तो मौत पक्की समझो …
.
तो.. तो। .. ऐसी स्थिति में
मुझे क्या करना चाहिए ?
बछड़े ने घबराहट में पुछा .
.
अगर तुम कभी भी शेर
को देखो... तो अपनी जगह
डट कर खड़े हो जाओ और
ये दिखाओ की तुम जरा भी
डरे हुए नहीं हो .
.
अगर वो ना जाएं तो... उसे
अपनी तेज सींघें दिखाओ
और खुरों को जमीन पर
पटको
.
अगर तब भी शेर ना जाएं
तो धीरे -धीरे उसकी तरफ
बढ़ो... और अंत में तेजी से
अपनी पूरी ताकत के साथ
उस पर हमला कर दो....
.
भैंसे ने गंभीरता से समझाया .
.
ये तो पागलपन है.... ऐसा
करने में तो बहुत खतरा है...
.
अगर शेर ने पलट कर मुझ
पर हमला कर दिया तो ??
बछड़ा नाराज होते हुए बोला .
.
बेटे... अपने चारों तरफ
देखो.. क्या दिखाई देता है ?
भैंसे ने कहा .
.
बछड़ा घूम -घूम कर देखने
लगा ...
.
उसके चारों तरफ ताकत वर
भैंसों का बड़ा सा झुण्ड था .
.
अगर कभी भी तुम्हे डर
लगे.. तो ये याद रखो कि हम
सब तुम्हारे साथ हैं....
.
अगर तुम मुसीबत का
सामना  करने की बजाये ,
भाग खड़े होते हो.... तो हम
तुम्हे नहीं बचा पाएंगे....
.
लेकिन अगर तुम साहस
दिखाते हो और मुसीबत से
लड़ते हो तो हम मदद के लिए
ठीक तुम्हारे पीछे खड़े होंगे .
.
बछड़े ने गहरी सांस ली
और अपने पिता को इस
सीख के लिए धन्यवाद दिया .
.
हम सभी की ज़िन्दगी में भी
शेर हैं … कुछ ऐसी समस्याएं
हैं जिनसे हम डरते हैं... जो
हमें भागने पर.... हार मानने
पर मजबूर करना चाहती हैं ,
.
लेकिन अगर हम भागते हैं
तो वे हमारा पीछा करती हैं
और हमारा जीना मुश्किल
कर देती हैं .
.
इसलिए उन मुसीबतों का
सामना करिये....
.
उन्हें दिखाइए कि आप
उनसे डरते नहीं हैं......
.
दिखाइए की आप सचमुच
कितने ताकतवर हैं..और पूरे
साहस और हिम्मत के साथ
उल्टा उनकी तरफ टूट पड़िये..
.
और जब आप ऐसा करेंगे
तो आप पाएंगे कि आपके
परिवार और दोस्त पूरी ताकत
से आपके पीछे खड़े हैं ....
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चन्द्रगुप्त मौर्य की गुरु भक्त्ति

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बात उस समय की है, जब अखंड भारत की नीव रखी जा रही थी,
और चन्द्रगुप्त मौर्य युद्ध में संघर्षरत था ।

तभी एक सर्प ने चन्द्रगुप्त मौर्य को डस लिया और वह मूर्छित हो भूमि पर गिर पड़ा ।

वह कोई साधारण सर्प नही था, उस सर्प का विष असाध्य था ।

सभी की अखंड भारत की आशा चन्द्रगुप्त पर ही टिकी थी,
परन्तु चन्द्रगुप्त तो पल प्रति पल म्रत्यु की ओर बढ़ रहा था ।

जिसके सिर पर गुरु का हाथ हुआ करता है,
उसका कोई भी अनहोनी कुछ नही बिगाड़ सकती ।

अनहोनी को होनी में और होनी को अनहोनी में बदलना पड़ता है ।

चन्द्रगुप्त भी पूर्ण शिष्य था, गुरु चाणक्य का ।

चन्द्रगुप्त म्रत्यु की ओर बढ़ते बढ़ते, अपने बाल्यकाल में पहुँच गया और उसने दूर पेड़ के नीचे अपना बाल स्वरूप देखा,
जो प्याले में कुछ पी रहा था ।

यह देख युवक ने बालक चन्द्रगुप्त से पूछा कि- तुम यह क्या पी रहे हो ।

तो उसने कहा- मेरे गुरुदेव मुझे प्रतिदिन यह औषधि देते है,
वही पी रहा हूँ ।

युवक चन्द्रगुप्त ने पूछा- तुमको कौन सा रोग है ।

तब बालक चन्द्रगुप्त कहता है कि - मै गुरुदेव से कोई भी प्रश्न नही करता, वह जो कहते है, वही मेरे लिए मान्य होता है।

तब युवक चन्द्रगुप्त कहता है कि- मै तुम्हारी गुरु भक्त्ति पर प्रश्न नही उठा रहा,
परन्तु यदि तुम गुरु आज्ञा का मम्र जान लोगे तो उस आज्ञा को भावना से निभा पाओगे ।

और यह सुन बालक चन्द्रगुप्त चल पड़े गुरुदेव के पास,
और गुरुदेव से यही प्रश्न करते है कि- हे गुरुदेव-आप मुझे प्रतिदिन कौन सी ओषधि देते है ।

गुरुदेव कहते है कि- तुम्हारे शत्रु तुम्हे बल से हरा नही पायेगे, परन्तु छल से अवश्य हरा सकते है और उस छल का सबसे उत्तम साधन है- विष ।

कोई भी विष देकर तुमको मुझसे छीन लेगा ।
अत: मै ऐसी प्रत्येक सम्भावना को समाप्त कर देना चाहता हूँ ।

इस कारण मै तुमको प्रतिदिन मीठे शहद में बूंद बूंद कर विष पिला रहा हूँ, ताकि तुम्हारे शरीर में विष से लड़ने की शक्त्ति आ सके ।

और दूसरी और युवक चन्द्रगुप्त यह सार द्रश्य देखकर वापस से अपने शरीर में लौट गया और अचानक से चन्द्रगुप्त की चेतना लौटी ।

उसका ह्रदय पुन: गातिमय हो गया। और उठते ही चन्द्रगुप्त ने यही कहा- वर्षो से गुरुदेव मुझे जो ओषधि पिला रहे थे,
उसका रहस्य मुझे आज पता चला और मेरे जीवन तो मेरे गुरुदेव ही है।

इसी के साथ अखंड भारत की स्थापना हुई ।

इस कार्य में चन्द्रगुप्त की शक्त्ति थी, उसकी गुरु भक्त्ति ।
गुरु आज्ञा के प्रति उसका समर्पण ।

गुरुदेव जो भी कराते, जो भी खिलाते, वही बिना प्रश्न किये स्वीकार करना । गुरुदेव का प्रत्येक कर्म उत्तम ।

हे साधको! जिस प्रकार से चन्द्रगुप्त का सवालरहित समर्पण उसका रक्षा सूत्र बन पाया। उसी प्रकार से प्रत्येक शिष्य का समर्पण,
उसकी बड़ी से बड़ी विपत्ति में भी रक्षा किया करता है ।

परन्तु शिष्य का यह समर्पण प्रश्नरहित होना चाहिये ।

अन्यथा, संशय की एक बूँद सब कुछ नष्ट की क्षमता रखा करती ।
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हल्दी

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भारत में हल्दी का प्रयोग अक्सर हर खाने में होता है। यह किचन में ही काम आने वाला मसाला नहीं है बल्कि हमारे और आपके स्वास्थ्य और त्वचा के लिए भी काफी गुणकारी है। इसका त्वचा के लिए प्रयोग काफी समय से प्रसिद्ध है पर आजकल बाजार में तरह-तरह की क्रीम आ जाने से इसको लोग प्रयोग नहीं करते। हम आपको इसके कुछ फायदे बताएगें जिसका आप लाभ उठा सकते हैं।
हल्दी के फायदे-
1.हल्दी शरीर या त्वचा पर पड़े पिगमेंटेशन को दूर करने में लाभप्रद है। इसका प्रयोग करने के लिए थोड़ी सी हल्दी को पीस कर उसमें नींबू की कुछ बूंदे मिलाइये या फिर चाहें तो इसको खीरे के साथ भी मिक्सी में पीस कर लगा सकती हैं। हल्दी का इस्तमाल आपको एक बार नहीं बल्कि अच्छा रिजल्ट देखना है तो कई बार करना चाहिये।
2.चेहरे पर पिंपल आ गए हों तो हल्दी पाउडर और उसमें चंदन तथा पानी मिला कर पेस्ट तैयार करें और चेहरे पर लगाएं। इससे पिंपल जल्दी ही ठीक हो जाएगें। हल्दी उन सभी क्रीमों से बेहतरीन होती है जो बाजार में अच्छी होने का दावा करती हैं।
3.यह बॉडी स्क्रब का भी काम करता है। बस नहाने से पहले हल्दी पाउडर, पानी और आंटे का पेस्ट बनाइये और शरीर पर रगडिये। ऐसा कई बार लगातार करने से आपका शरीर चमक उठेगा और स्वस्थ्य रहेगा। अगर हालही में आपकी शादी होने वाली है तो इस पेस्ट को अभी से ही लगाना शुरु कर दें।
4.अगर गर्भावस्था के दौरान आपके पेट पर स्ट्रैच मार्क्स आ गए हैं और अब जा नहीं रहे हैं तो, हल्दी को दही के साथ प्रयोग करें। इस पेस्ट को रोज अपने पेट पर 6 मिनट तक के लिए लगाएं। ऐसा करने से स्ट्रेच मार्क्स धीरे धीरे चले जाएगें।
5.वे लोग जो अपने मुंह पर अनचाहे बाल से परेशान हैं, उनको हल्दी लगानी चाहिये। लगातार इसको लगाने से चेहरे से बाल धीरे धीरे कम होने लगेगें।
6.अगर आपने अपने हाथों को किचन में खाना बनाते वक्त जला लिया है तो उस पर हल्दी और एलो वेरा जैल लगा लीजिये। इससे जलन कम होगी और हाथों में दाग भी नहीं पड़ेगा।
7.हल्दी से दांत संबधि बीमारी भी ठीक हो जाती है। अगर संक्रमण है तो हल्दी, सेंधा नमक और सरसों के तेल का पेस्ट बनाएं और इसको दिन में तीन बार अपने संक्रमण वाली जगहं पर रखें। इसके बाद गरम पानी से अपने मुंह को धो लें, इससे आपका रोग बिल्कुल ठीक हो जाएगा।
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इंडियन व्यवस्था के हिन्दू विरोधी निर्णयों को नकारने की आवश्यकता क्यों ?

।। मटकी प्रकरण ।।

आये दिन कई विषयों पर इंडियन शासकों, प्रशासकों व न्यायाधीशों के धार्मिक आधार पर हिन्दू विरोधी दोहरे मानदंड सामने आते रहते हैं। एक अभी आया जिसमें इंडिया के सर्वोच्च न्यायालय ने मटकी फोडने वाले बच्चों की आयु 18वर्ष तय कर दी।अब यदि थोड़ी और हिम्मत दिखा कर सर्वोच्च न्यायालय इस्लामिक "खतना" की उमर भी बता देता तो उसके निर्णय पर आपत्ति न उठी होती। खतना में छोटे-छोटे बच्चों को बहुत दर्द होता है। रक्तस्राव, संक्रमण और कई बार तो छोटे बच्चों की मौत भी हो जाती है।

कोर्ट को मटकी तो दिखी लेकिन वे बच्चे नहीं दिखते जो मोहर्रम के नाम पर रक्तरंजित हो जाते हैं, कोर्ट को सांडो की लड़ाई का खेल जलीकट्टू तो दिखता है, जिसपर वो प्रतिबंध लगा देता है, लेकिन कत्लखाने नहीं दिखते, अल्लाह की बलि के नाम पर कटते पशु नहीं दिखते ? इंडियन कोर्ट अगर शनि सिंगनापुर और अन्य मन्दिरों की परम्पराओं में हस्तक्षेप करते समय हाजी अली दरगाह की परम्परा व मस्जिदों में भी हस्तक्षेप करती तो विश्वसनीयता बरकरार रहती ।

अब जब न्याय भी धर्म को देख कर होगा तो हिन्दू जनता भी विद्रोह पर मजबूर होगी .

यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि जनता और उस का मत ही सर्वोपरी है , वही तख्त पर बिठाती है और वही कुचल भी डालती है। महाराष्ट्र के मटकी प्रकरण में अदालत के प्रतिबंध को में मानव समाज की "सहज चेतना" के विरूद्ध मानता हूँ। क्योंकि, प्रकृति के साथ मानव जीवन की "प्रतिस्पर्धा" जन्मगत है। हिमालय की ऊंचाई हो या फिर सागर की अतल गहराई ! प्रकृति की चुनौती को मानव ने हमेशा स्वीकार किया है.!! यही वजह है कि, एडमण्ड हिलेरी या शेरपा तेजिनग अपनी राष्ट्रीयता के बाहर निकल मानव समाज के नायक बने.!!!

अब जब अदालत ने 35 फुट की पाबन्दी लगा दी है तो, सीधे तौर पर मानव के अदम्य साहस और जिजीविषा को प्रतिबंधित कर दिया है..!!! और अदालत का यह कदम मानवीय नहीं बल्कि मानव समाज के साहस उत्साह को रोकने का अदालती कुचक्र है।

इसका दूसरा पक्ष और भी घृणित है। जैसे-जैसे चुनौती बड़ी होती है... मानव समाज एकजुट होता है। और यह भावना विदेशी आक्रमण या बाढ़, सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदा के समय शक्ति के साथ दिखाई देती है। ऐसे समय मानव समाज जाति, आस्था और तमाम दूसरे फर्क को मिटाकर कर एकजुट हो जाता है। और इस तरह की घटनाओं से ही समाज के अनन्य साहसी शिवाजी- चन्द्रशेखर आजाद जैसे वास्तविक नायक उभरते हेँ।

भारत के ऐसे आयोजन हिन्दू समाज को जाति से मुक्त कर एकजुट करते हेँ। यह समाज की प्रतिस्पर्धा है ! जिजीविषा की प्रतिस्पर्धा है! और इसके "नियम" हर मानव समाज अपने गठन के साथ लेकर पैदा हुआ है। यह किसी "संविधान" का मोहताज नहीं है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पवित्र पर्व पर पक्षपात की हांडी फोड़कर व्यवस्था परिवर्तन की सार्थक पहल करने वाले नन्हें बच्चों व भाई- बहनों को बहुत- बहुत हार्दिक बधाई।

।। विवाह ।।

विवाह की आयु को लेकर दोहरे मापदंड:-

अब बात इंडियन व्यवस्था में विवाह की आयु को लेकर दोहरे मापदंड पर, जिस को लेकर बहुत बार विवाद होते रहते है। हाल ही में देश के युवाओं में विवाह की आयु को लेकर हिन्दू पंचायतों ने एक प्रस्ताव, जिसमें ‘‘16 वर्ष लड़की एवं 18 वर्ष लड़के की आयु में सहमति से विवाह को वैध बनाने की मांग’’ है। ध्यान देने वाली बात है कि केवल सुझाव ही दिया है, कोई आदेश नहीं सुनाया ! जिस पर शासकों, प्रशासकों, बुद्धिजीवीयों व कोर्ट सभी ने विरोध जता दिया। तनिक ध्यान दे तो विरोध करने वालो का दोहरा व्यवहार समझ में आ जायेगा।

बिना विवाह किये ‘‘लीव-इन-रिलेशनशिप" के अवैध शारीरिक सम्बन्धों को वैधानिकता प्रदान करने वाले व रखैल संस्कृति के समर्थको और हिन्दू पंचायतो के 16-18 वर्ष में विवाह की न्यूनतम सीमा तय करने के सुझाव को नकारने वालो को क्या यह नहीं सोचना चाहिए कि देश का भविष्य कहलाने वाले युवा अब इतने कमजोर नहीं रहे। वे हर मुसीबत का सामना करने में सक्षम है! जन्म से लेकर मृत्यू तक अपार प्रेम करने वाले माता- पिता को जो धोखा दे सकते है! इसी बाली ऊमर में क्षणिक उन्माद में पैदा हुए प्यार के लिए घर छोड़कर भाग सकते है! मॉं बापू के निस्वार्थ अथाह प्यार को भूलकर एक ऐसे इन्सान से प्रेम विवाह कर बैठते है जिससे वो अभी-अभी मिले है! उसके सामने अपने मॉ बाप को तुच्छ, मुर्ख समझते है! ये सोचते है कि मां-बाप उनके प्यार को कभी नहीं समझ सकते! जो ये भी सोचते नहीं की जन्मदाताओं पर क्या बीतेगी, और अपना स्वयं का अलग घर बसा लेते है ! उनकी उसी स्वेच्छा में यदि समाज की स्वीकृति जुड़ जाये तो उसमें आपत्ती क्या है?’’

जरा अतीत में क्या है देखें!

थोड़ा याद करें तो कुछ वर्ष पूर्व का मामला है, इसी इंडियन व्यवस्था के महिला एवं बाल विकास विभाग की मुखिया ‘‘कृष्णा तीरथ’’ एक बिल बनाने में व्यस्त थी। उनकी योजना यह थी कि 13 वर्ष के नाबालिको को सहमती से सेक्स करने की इजाजत दे दी जाये। चुंकि वैसे भी इस उम्र के बाद युवा इस तरह के मामलो में लिप्त पाये जा रहे है। तो उनका सोचना भी उनके खुद की नजर में शायद उचित हो पर इस मुद्दे पर पूरे देशभर में कटु प्रतिक्रिया हुई। परिणाम स्वरूप इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अरे भाई जब नाबालिक आयु में सेक्स की स्वीकृति के बारे में सोचा जा सकता है तो फिर हिन्दू पंचायतों के सुझाव में ‘‘कम उम्र में विवाह‘‘ से आपत्ति क्यों है? सोचिए!

अब बात हिन्दू पंचायतों के सुझावों की:-

हिन्दू पंचायतों ने शादी की उम्र कम करने का जैसे ही सुझाव दिया तो सरकारी नुमाइंदो की भोहे तन गई है! देश के बहुत से बुद्धिजीवी इस बात का घोर विरोध करते नजर आये! कुछ लोग तो सिर्फ टीवी पर दिखने मात्र के लिए हिन्दू पंचायतों को खरी-खोटी सुनाते नजर आए! तो कुछ लोगो के पास तर्क-वितर्क भी मौजूद है। विरोध करने के लिए वे एक शब्द का बहुत जिक्र करते है बालिकाओं की कम उम्र में पायी जाने वाली ‘‘बायोलॉजिकल और मानसिक स्थिति’’।

बायोलॉजिकल परेशानियाँ:-

18 वर्ष की उम्र में शादी-बंधन वाला कानून जिस समय लागू किया गया था। उस समय परिस्थितियां निश्चित ही कुछ अलग रही होंगी। जैसे कि सुनने में आया है कि उस समय लड़कियों के ‘‘मासिक धर्म’’ 16 वर्ष की आयु में शुरू होते थे। दूसरा उस समय की तकनीकी इतनी विकसित नहीं थी जिससे जानकारियों का अभाव होने से समझदारी थोड़ी देरी से विकसित होती होगी। परन्तु अभी तो कक्षा 4 के बच्चों में भी देश और दुनिया की जानकारी आपसे-हमसे अधिक ही बैठेगी। उन्हे प्यार करना, रोमांस करना, सेक्स करना, शादी करना, तलाक लेना, सास- ससुर से निपटना सब कुछ हमारे घर में रखा हुआ टेलीवीजन व जेब में रखा हुआ मोबाइल फोन सब कुछ सिखा देता है। ऊपर से इन्टरनेट की उपलब्धता।

मेरी बात कुछ लोगो को शायद चुभ भी जाए लेकिन टीवी- मोबाइल पर देखे कार्यक्रमों की नकल कर-करके घरों में कई चीजों के ‘‘प्रेक्टिकल’’ आपके बच्चे कर चुके होते है, आप और हमें तो हवा भी नहीं लगती!

मुस्लिम समाज में उसी बाली ऊमर में शादी को हमारी ही इंडियन कानून व्यवस्था मान्यता देती है! उसका क्या? क्या मुसलमान मानव नहीं होते? क्या उनके धर्म की लड़कियों को बायोलॉजिकल परेशानी नहीं होती? ये भारत जैसे पंथनिरपेक्ष देश में ऐसा भेदभाव क्यों ? क्या यहीं है सेक्युरिज्म ? या हम हिन्दुओं को मूर्ख बनाया जा रहा हैं ?

कुछ काम के प्रयोग जो मीडिया वाले दिखाते और वैज्ञानिक करते रहते है!

आजकल दिन प्रतिदिन देश में बिना किसी कारण के कई सर्वे होते रहते है। बालिगो-नाबालिगो के सेक्स जीवन पर भी कई सर्वे हुए। अगर उनकी फाईनल ड्राफ्टिंग देखी जाए तो अधिकतर का निष्कर्ष यही मिलता है कि हमारे युवा 18 वर्ष की दहलीज पर आते-आते 1 से अधिक साथियों या एक ही साथी के साथ कई बार ‘‘सेक्स’’ का आनंद ले चुके होते है। अब फिर वही सवाल जब अपनी मर्जी से इतना सेक्स कर ही चुके है तो शादी करके सेक्स करने में क्या आपत्ति है?

यथार्थ विषय !

मेरे हृदय में एक प्रश्न यह भी उठता है जिन बालिकाओं को 13 वर्ष की नाबालिग उम्र में सेक्स करने की अनुमती देने की बात सरकार सोच सकती है। उन बालिकाओं को 16 वर्ष की बाली ऊमर में शादी के बाद सेक्स करने देने में क्या आपत्ति है? शादी के बाद शारीरिक सम्बंधो के अलावा ऐसा होता क्या है जिससे उन्हे शादी से रोका जाए? मित्रों,ये तो विचित्र बात हुई कि चाहे जितना मन मर्जी कम उम्र में सेक्स के मजे तो लेते रहो, शादी के बंधन में में बंधकर जीवन जीना वर्जित है।

एक बाली ऊमर वाली कन्या का उदाहरणः-

एक लड़की जिसकी आयु लगभग 14 वर्ष रही होगी। वह मोहल्ले में ऐसे रहती थी जैसे उसने किसी लड़के को आंख उठाकर भी नहीं होगा। मेरे सामने तो वह शर्म से छुप जाती थी। वह कहां और कैसे अपने मित्र के साथ छुप-छुपकर शारीरिक सम्बंध बनाते हुए प्रेग्नेंट हो गयी, वही जाने। जब बात खुली तो उसने बताया कि उसके सम्बंध बहुत पुराने है। उस लड़की की माँ जिसे उसके चारित्रिक गुणों पर गर्व था, जो हमेशा उसका मोहल्ले भर में गुनगान करती थी। वह जानकर स्तब्ध रह गई कि उसकी बेटी ने छुपकर मंदिर में विवाह कर लिया था! अपने नाबालिक मित्र से! और ना जाने कितनी ही बार सुहागरात मना चुकी थी! और आश्चर्य की बात तो यह है कि उसे ऐसा करते हुए कोई बायोलॉजिकल परेशानी नहीं आयी। अब कहां गया बाली ऊमर का कानून? अंत में वो मां अपने अपनी बेटी की ऐसी हरकत पति को भी नहीं बता पाई और गुपचुप उसके गर्भ की सफाई करवा दी।

इसके आगे आप समझ गये होगे कि उस माँ के दिल पर अपनी बेटी को लेकर क्या बीती होगी। अधिक लिखने से उस बेचारी के लिए मुसिबत भी आ सकती है। क्योंकि अब वह लड़की बालिग हो चुकी है और अब समाज की मर्जी से शादी करना चाहती है। नाबालिक अवस्था में सहमती सेक्स करने वाले हमारे नाबालिको की स्थिति जब प्रेग्नेंसी तक पहुंचती है। तो बात उसके स्वयं के और पालको के गले में फस जाती है। बात समाज की, इज्जत की और उम्र की आ जाती है। न चाहते हुए भी वे एक और अपराध कहे या पाप वह भी करने हेतु विवश हो जाते हैं। सामाजिक अपयश से बचने के लिए ‘बच्चा’ परिवार की सहमति से गिरा दिया जाता है। एक नवजीवन की हत्या कर दी जाती है।

अन्त में समाधान:-

परिस्थितियों व मानव की मानसिकता को यदि देखा जाये तो हिन्दू पंचायतों का सुझाव सार्थक व अनुक्रणीय हैं। हिन्दू समाज को उसे मुक्त हृदय से स्वीकार करना चाहिए। विवाह की आयु 18 एवं 16 वर्ष करके विवाह करना या न करना ये युवाओं के विवेक पर छोड़ देना चाहिए। हाँ एक प्रतिबंध अवश्य लगाया जाए कि 18 वर्ष की आयु से पहले वे बच्चा पैदा न करें। कन्या को शादी के बाद भी पूरी स्वतंत्रता दी जाये। कन्या की पढ़ाई अनिवार्य कर दी जाए चाहे वह मायके में रहे या ससुराल में। क्योंकि वह आपके भरोसे इस दुनियां में आ रही है तो उसकी पालन- पोषण, शिक्षा और सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी है।

बातें संविधान की:-

वो लोग जो संविधान को लेकर हिन्दू समाज का शोषण व दमन करते रहते है, वे जान ले कि संविधान कोई ऐसी ईश्वरीय पुस्तक नहीं है, जो दोबारा से न लिखी जा सके। ब्रिटिश अंग्रेजों ने अपनी आवश्यकता अनुसार इंडियन संविधान लिखा, सत्ता-हस्तांतरण के बाद अंग्रेजों के अनुयायियों ने उसी इंडियन संविधान को थोड़ा- बहुत बदलाव के साथ भारत पर लागू कर दिया। बाद में इंदिरा- राजीव, चन्द्रशेखर, वाजपेयी जैसे लोग अपने हितों के हिसाब से संविधान में बदलाव करते रहें, जैसे अभी प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी जी कर रहे है, भूमि अधिकरण कर रहे है तो संविधान बदल रहे हैं, देश में विदेशी कम्पनीयों को बुला रहे हैं, 100% विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को स्वीकृति दे रहे है तो संविधान बदल रहे हैं।

जब निजी हितों- नीतियों के लिए संविधान बदला जा सकता है, तो हिन्दू हितों के लिए भी संविधान बदला जाना चाहिये।

हिन्दुओं की धार्मिक व सांस्कृतिक मान्यताओं को लेकर विश्व के किसी भी देश के संविधान के आदेश को मानने के लिएहिन्दुओं को विवश नहीं किया जा सकता, क्योंकि सभी देशों के संविधान साम्राज्यवादी शक्तियों ने अपने हितों के अनुसार लिखे हैं।

जो लोग संविधान के नाम पर हिन्दू समाज की आस्थाओं को प्रतिबंधित करने का दु:साहस करते है। "मानवीय" होने का नकाब पहनकर भारत की सांस्कृतिक चेतना का "बलात्कार" करते है। उनके निर्णय "हिन्दू विरोधी" ही नहीं, वे "मानवता" के अभियान को दूषित करने के "अपराधी" भी है। ऐसे लोगो के हिन्दू विरोधी निर्णयों को कूड़ेदान में डालना ही होगा। यही धर्म है, यही हमारा दायित्व है।

आपका भाई
विश्वजीत सिंह अनन्त
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारत स्वाभिमान दल